पत्थरों में तराश रहे जिंदगी: ढाई कुसुम के कारीगरों की मेहनत को नहीं मिल रहा उचित मोल

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धालभूमगढ़ : झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिला स्थित धालभूमगढ़ प्रखंड से सटे पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती गांव ढाई कुसुम में आज भी सदियों पुरानी पाषाण शिल्प कला जीवित है। मशीनी युग के दौर में भी यहां के कारीगर बिना किसी आधुनिक उपकरण के पत्थरों से तराशकर उपयोगी और आकर्षक वस्तुएं तैयार कर रहे हैं। हालांकि कठिन मेहनत और अद्भुत हुनर के बावजूद उन्हें उनकी कला का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है।


बेलपहाड़ी थाना के अंतर्गत आने वाले इस गांव में कारीगर पारंपरिक औजारों छेनी और हथौड़ी की मदद से कठोर पत्थरों को काटकर सुंदर आकार देते हैं। पत्थरों को पहाड़ों से लाना, उन्हें तराशना और घंटों मेहनत कर फिनिशिंग देना बेहद कठिन और समय लेने वाला कार्य है।
गांव के कारीगर मोतीलाल सिंह और उनके साथी पत्थरों से थाली, कटोरी, गिलास, लोटा, घड़ा, टिफिन, ओखली, चौकी-बेलना जैसे घरेलू सामान तैयार करते हैं। इसके अलावा सिंदूरदानी, अगरबत्ती स्टैंड, मोमबत्ती स्टैंड और आकर्षक शिवलिंग जैसी सजावटी एवं धार्मिक वस्तुएं भी बनाई जाती हैं। ग्राहकों की मांग पर विशेष डिजाइन के उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं।


स्थानीय लोगों के अनुसार, एक वस्तु को तैयार करने में कई दिनों की मेहनत लगती है, लेकिन बदले में मिलने वाली मजदूरी बेहद कम होती है। उचित बाजार और सरकारी सहयोग के अभाव में कारीगर आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। बिचौलियों के कारण भी उन्हें अपने उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिल पाता।


ग्रामीणों का कहना है यदि सरकार इस पारंपरिक हस्तशिल्प को बढ़ावा दे, कारीगरों को आर्थिक सहायता एवं प्रशिक्षण उपलब्ध कराए और उनके उत्पादों को बड़े बाजारों तथा हस्तशिल्प मेलों से जोड़े, तो यह विलुप्त होती कला नई पहचान हासिल कर सकती है।ढाई कुसुम गांव की यह कला सिर्फ पत्थरों को तराशने की कहानी नहीं, बल्कि उन मेहनतकश हाथों की दास्तान है जो अभावों के बीच भी अपनी परंपरा और विरासत को जीवित रखने में जुटे हैं।

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