वनपाल की भारी कमी से झारखंड के जंगलों पर संकट, नियुक्ति नियमावली नहीं बनने पर उठे सवाल

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Ranchi : झारखंड में वन विभाग की जमीनी व्यवस्था इन दिनों गंभीर संकट से जूझ रही है। विभाग में वनपाल (Forester) के स्वीकृत 1062 पदों के मुकाबले वर्तमान में कार्यरत वनपालों की संख्या नगण्य बताई जा रही है, जिससे वन प्रबंधन और संरक्षण कार्यों पर सीधा असर पड़ रहा है।

वनपाल पद को विभाग का रीढ़ माना जाता है। वन अपराधों से जुड़े मामलों में अभियोजन प्रतिवेदन तैयार करने से लेकर विभिन्न योजनाओं में आवंटित राशि के निष्पादन तक, इनकी भूमिका बेहद अहम होती है। ऐसे में इस पद पर भारी रिक्तता राज्य के वन प्रशासन की कार्यक्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

हाल ही में करीब 1300 वनरक्षियों को प्रोन्नति देकर प्रधान वनरक्षी बनाया गया, लेकिन यह प्रक्रिया विवादों में रही। आरोप है कि प्रोन्नति से पूर्व आवश्यक दो माह का अनिवार्य रिफ्रेशर प्रशिक्षण कैबिनेट स्तर पर शिथिल कर दिया गया और बिना प्रशिक्षण के ही पदोन्नति दे दी गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जल्दबाजी में की गई पदोन्नति से भविष्य में पदोन्नति की प्रक्रिया और लंबी हो जाएगी, जिससे निचले स्तर के पदों पर असंतुलन और बढ़ सकता है।

ऐसे परिदृश्य में सरकार द्वारा वनपाल नियुक्ति नियमावली का अब तक तैयार नहीं किया जाना और खुली बहाली (ओपन भर्ती) की प्रक्रिया शुरू नहीं करना एक गंभीर प्रशासनिक चूक के रूप में देखा जा रहा है।

वन विशेषज्ञों और कर्मचारियों का कहना है कि यदि जल्द ही वनपाल पदों पर नियुक्ति नहीं की गई, तो राज्य के जंगलों की निगरानी, संरक्षण और प्रबंधन प्रभावित होगा, जिसका सीधा असर पर्यावरण और जैव विविधता पर पड़ेगा।

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