राष्ट्रपति से मिली ऑल इंडिया हो लैंग्वेज एक्शन कमिटी, आठवीं अनुसूची में ‘हो’ भाषा शामिल करने की रखी मांग

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New Delhi: जनजातीय पहचान और भाषाई अधिकारों की आवाज आज फिर एक बार राष्ट्रपति भवन तक पहुंची। ऑल इंडिया हो लैंग्वेज एक्शन कमिटी के 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात कर “हो भाषा” को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग दोहराई।

प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को मांगपत्र सौंपा और बताया कि देश भर में 50 लाख से अधिक लोग अपने दैनिक जीवन में ‘हो’ भाषा का प्रयोग करते हैं। उल्लेखनीय है कि 2023 में भी समिति ने इसी मुद्दे पर राष्ट्रपति से भेंट की थी।

मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति मुर्मू ने प्रतिनिधियों से ‘हो’ भाषा में ही संवाद किया, जिससे पूरे दल में उत्साह का माहौल रहा। समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामराय मुन्दुईया ने बताया कि “हो भाषा केवल एक माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और अस्मिता की पहचान है। संवैधानिक मान्यता से इसका संरक्षण और प्रसार सुनिश्चित होगा।”

राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष सुरा बिरुली ने कहा कि “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतनी बड़ी जनजातीय आबादी अभी तक अपनी मातृभाषा के संवैधानिक अधिकार से वंचित है, जबकि कई छोटी भाषाएं पहले ही आठवीं अनुसूची में शामिल हो चुकी हैं। हो भाषा को मान्यता मिलना भारत की भाषाई विविधता को और समृद्ध करेगा।”

उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले ही ‘हो’ भाषा को अनुसूची में शामिल करने का आश्वासन दे चुके हैं, जबकि झारखंड और ओडिशा सरकारें अनुशंसा पत्र भेज चुकी हैं। झारखंड में ‘हो’ को द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त है।

प्रतिनिधिमंडल में रामराय मुन्दुईया, सुरा बिरुली, बाजू चंद्र सिरका, गिरीश चंद्र हेम्ब्रोम, शान्ति सिदु, बसंत बुडीउली, फूलमती सिरका, जगारनाथ केराई, खिरोद हेम्ब्रोम, गोपी लागुरी, गोमिया ओमंग और निकिता बिरुली शामिल थे।

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