Seraikela : सरायकेला जिले के भुरकुली गांव में मंगलवार को आयोजित पारंपरिक ‘भोक्ता फोड़ा’ उत्सव के दौरान आस्था, साहस और परंपरा का अद्भुत संगम देखने को मिला। भगवान शिव के प्रति अटूट विश्वास का प्रदर्शन करते हुए भोक्ताओं ने अपने शरीर की परवाह किए बिना हैरतअंगेज करतब दिखाए, जिसे देखकर हजारों श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।
उत्सव की शुरुआत पारंपरिक विधि-विधान के साथ हुई। भोक्ताओं ने स्थानीय तालाब में स्नान कर पूजा-अर्चना की, जिसके बाद कठिन तपस्या का दौर शुरू हुआ। बाघरायडीह के कृष्णा सरदार और भुरकुली के बबलु सरदार सहित कई श्रद्धालुओं ने अपनी पीठ में लोहे के हुक फंसाकर अद्भुत करतब प्रस्तुत किए।

बबलु सरदार ने 15 फीट ऊंचे बांस के सहारे चलती गाड़ी पर झूलते हुए अपनी भक्ति का प्रदर्शन किया, जबकि कृष्णा सरदार ने हुक के सहारे एक साथ दो बैलगाड़ियों को खींचकर सभी को अचंभित कर दिया। वहीं सोनू कर्मकार ने अपने गालों के आर-पार लोहे के साइकिल स्पोक डालकर आस्था की चरम सीमा का परिचय दिया। अन्य भोक्ताओं ने भी अपने शरीर में सुई-धागा चुभाकर अपनी मन्नत पूरी करने की परंपरा निभाई।
इस धार्मिक आयोजन का एक प्रमुख आकर्षण सरायकेला शैली पर आधारित छऊ नृत्य रहा। ग्रामीणों के अनुसार, यहां 1908 से इस नृत्य परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है। पूरी रात चले सांस्कृतिक कार्यक्रम में छोटे कलाकारों ने ‘दापुन निडा’ नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया।
इसके अलावा बंदना, मेघबारी, द्वापर लीला, लव-कुश, होली, सीता चोरी, चार अवतार, पहाड़ी कन्या, मेघदूत और परिखंडा जैसे पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियों ने माहौल को जीवंत बनाए रखा। बुजुर्गों का कहना है कि यह उनकी सांस्कृतिक विरासत है, जिसे वे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचा रहे हैं।
हजारों श्रद्धालुओं ने इस आयोजन में भाग लेकर भोक्ताओं का उत्साहवर्धन किया और उन पर पुष्प वर्षा की। स्थानीय ग्रामीणों ने भी आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ग्रामीणों की मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां भगवान शिव का स्मरण करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। चैत्र पर्व के समापन पर आयोजित इस ‘भोक्ता फोड़ा’ उत्सव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आधुनिकता के दौर में भी ग्रामीण संस्कृति और धार्मिक आस्था की जड़ें बेहद गहरी हैं।











