Adityapur : झारखंड राज्य में निवास करने वाले उड़िया भाषी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए 28 मार्च का दिन गहरा क्षोभ लेकर आया। झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) के लिए जारी आधिकारिक सिलेबस में क्षेत्रीय भाषा ‘उड़िया’ को उसकी मौलिक लिपि के बजाय देवनागरी में दर्शाए जाने पर समुदाय के अभ्यर्थियों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।
उड़िया भाषी अभ्यर्थियों और समुदाय के प्रतिनिधियों का कहना है कि यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि उनकी भाषाई पहचान पर सीधा आघात है।
अपर उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन
मामले की गंभीरता को देखते हुए अभ्यर्थियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन सरायकेला-खरसावां जिले के अपर उपायुक्त जयबर्धन कुमार को सौंपा। ज्ञापन में कहा गया है कि उड़िया भाषा की अपनी समृद्ध एवं प्राचीन लिपि है, जिसे सिलेबस में नजरअंदाज करना अनुचित है।
ज्ञापन प्राप्त करने के बाद अपर उपायुक्त ने त्वरित कार्रवाई करते हुए पत्र के माध्यम से कोल्हान आयुक्त को स्थिति से अवगत करा दिया है।
संवैधानिक प्रावधानों का हवाला
अभ्यर्थियों ने अपने ज्ञापन में उल्लेख किया है कि उड़िया भाषा भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल है तथा इसे ‘शास्त्रीय भाषा’ का दर्जा प्राप्त है। उन्होंने अनुच्छेद 350 (बी) का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान भाषाई अल्पसंख्यकों की भाषा और लिपि के संरक्षण की गारंटी देता है।
उनका तर्क है कि उड़िया की स्वतंत्र लिपि को दरकिनार कर देवनागरी में सिलेबस जारी करना न केवल तकनीकी रूप से त्रुटिपूर्ण है, बल्कि परीक्षार्थियों के लिए व्यावहारिक कठिनाई भी उत्पन्न करता है।
अभ्यर्थियों की प्रमुख मांग
उड़िया भाषी युवाओं का कहना है कि झारखंड के कोल्हान समेत कई जिलों में बड़ी संख्या में उड़िया भाषी आबादी निवास करती है। टीईटी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा में लिपि की इस चूक से हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने सरकार से मांग की है कि सिलेबस को तत्काल संशोधित कर उड़िया भाषा को उसकी मूल लिपि (उड़िया लिपि) में प्रकाशित किया जाए, ताकि भाषाई अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।








