Jadugoda : पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी प्रखंड अंतर्गत उत्तरी इचड़ा पंचायत के धर्मडीह बस्ती में लगभग 40 लाख रुपये की लागत से बना जलमीनार ग्रामीणों के लिए राहत का साधन बनने के बजाय “सफेद हाथी” साबित हो रहा है। निर्माण के करीब तीन वर्ष बाद भी यह परियोजना पूरी तरह चालू नहीं हो सकी है, जिसके कारण गांव के 86 घर आज भी पेयजल संकट से जूझ रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार जलमीनार से नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं होने के कारण लोग मजबूरी में UCIL के नलों पर निर्भर हैं। वहां घंटों लाइन में लगने के बाद ही पानी मिल पाता है। गर्मी के दिनों में जब पानी की सप्लाई कम हो जाती है, तब हालात और भी बदतर हो जाते हैं। ऐसे में महिलाओं को दूर-दराज से पानी ढोना पड़ता है, जिससे उनकी परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि जलमीनार का निर्माण घटिया गुणवत्ता के साथ किया गया, जिसके कारण यह दो साल के भीतर ही बंद हो गया। स्थिति यह है कि रख-रखाव के नाम पर प्रत्येक घर से हर महीने 30 रुपये वसूले जाते रहे, लेकिन मरम्मत की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार मुसाबनी प्रखंड कार्यालय और पंचायत प्रतिनिधियों से शिकायत की, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला। आंधी-तूफान के दौरान जलमीनार पर लगा सोलर प्लेट भी उड़ गया और अब पूरे परिसर में झाड़ियां उग आई हैं, जिससे यह योजना पूरी तरह उपेक्षित नजर आती है।
ग्रामीणों को उम्मीद थी कि शिकायत के बाद प्रशासन पहल करेगा, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं। सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन धरातल पर योजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाता।
सामाजिक कार्यकर्ता बसंत टोपनो ने कहा कि संबंधित विभाग को इस मामले पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए और ग्रामीणों की समस्या का समाधान करना चाहिए। वहीं अधिवक्ता कौशल सोरन ने इसे सरकारी तंत्र की विफलता बताते हुए कहा कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद लोगों को पानी जैसी मूलभूत सुविधा नहीं मिलना गंभीर चिंता का विषय है।
अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर प्रशासन और जनप्रतिनिधि कब इस समस्या पर ध्यान देंगे और धर्मडीह के ग्रामीणों को पेयजल संकट से राहत मिलेगी, या फिर लाखों की यह योजना यूं ही बदहाली की मिसाल बनी रहेगी।











