Seraikela:देश के सबसे वरिष्ठ और कुख्यात माओवादी नेताओं में शामिल प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का रांची की जेल में निधन हो गया। उनकी मौत के साथ ही माओवादी संगठन के एक बड़े और प्रभावशाली अध्याय का अंत माना जा रहा है।
प्रशांत बोस, प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य और ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो के सचिव थे। संगठन में उन्हें ‘थिंक टैंक’ और मुख्य रणनीतिकार के रूप में जाना जाता था। बताया जाता है कि माओवादी नेता किशन जी की मौत के बाद उन्होंने संगठन की कमान संभाली थी।
पश्चिम बंगाल मूल के प्रशांत बोस पिछले चार दशकों से अधिक समय तक भूमिगत रहकर माओवादी गतिविधियों का संचालन करते रहे। वर्ष 2004 में ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ और ‘पीपुल्स वॉर ग्रुप’ के विलय में उनकी अहम भूमिका रही, जिससे वर्तमान माओवादी संगठन का गठन हुआ।
संगठन के भीतर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उनके सुझावों को अंतिम निर्णय माना जाता था। झारखंड पुलिस की मोस्ट वांटेड सूची में वह पहले स्थान पर थे और उन पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था।
प्रशांत बोस पर झारखंड, बिहार और ओडिशा समेत कई राज्यों में 100 से अधिक मामले दर्ज थे। वह पूर्व सांसद सुनील महतो और पूर्व मंत्री रमेश सिंह मुंडा की हत्या के मुख्य साजिशकर्ता माने जाते थे।
इसके अलावा गिरिडीह शस्त्रागार लूट (2004), सारंडा में 16 पुलिसकर्मियों की हत्या और जहानाबाद जेल ब्रेक जैसी घटनाओं में भी उनकी भूमिका बताई जाती है।
12 नवंबर 2021 को सरायकेला-खरसावां जिले के कांड्रा स्थित गिद्दीबेड़ा टोल ब्रिज के पास झारखंड पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने संयुक्त अभियान चलाकर उन्हें गिरफ्तार किया था। उस समय वह अपनी पत्नी शीला मरांडी के साथ इलाज कर लौट रहे थे।
गिरफ्तारी के दौरान उनके साथ कई अन्य सहयोगियों को भी पकड़ा गया था और नक्सली गतिविधियों से जुड़े सामान बरामद किए गए थे।
सूत्रों के अनुसार प्रशांत बोस लंबे समय से पैरालिसिस (लकवा) से पीड़ित थे। वर्ष 2019 में उन्हें स्ट्रोक आया था, जिसके बाद वह सक्रिय रूप से चलने-फिरने में असमर्थ हो गए थे। गिरफ्तारी से पहले वह गिरिडीह के पारसनाथ इलाके में इलाज करा रहे थे।
कोल्हान क्षेत्र में ‘किशन दा’ का व्यापक प्रभाव था। पश्चिमी सिंहभूम जिले में ही उनके खिलाफ 30 से अधिक मामले दर्ज थे। सारंडा और आसपास के जंगलों में उनका मजबूत नेटवर्क माना जाता था।
प्रशांत बोस की मौत को सुरक्षा एजेंसियां माओवादी आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका मान रही हैं। लंबे समय तक संगठन की रणनीति और विस्तार में उनकी अहम भूमिका रही, जिसने उन्हें नक्सल आंदोलन का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना दिया था।









