सरना धर्म को संवैधानिक मान्यता देने की मांग तेज, आदिवासी सेंगेल अभियान ने राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन

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Jamshedpur:शहर में सोमवार को आदिवासी सेंगेल अभियान के बैनर तले आदिवासी समाज ने अपनी धार्मिक पहचान को लेकर जोरदार आवाज उठाई। उपायुक्त कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन करते हुए देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें “सरना धर्म” को संवैधानिक मान्यता देने और आगामी जनगणना में इसके लिए अलग कोड निर्धारित करने की मांग की गई।

इस अभियान का नेतृत्व संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व सांसद सालखन मुर्मू कर रहे हैं। ज्ञापन में कहा गया है कि देश के लगभग 15 करोड़ आदिवासी, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है, उन्हें अब तक अपने धर्म की स्वतंत्र पहचान नहीं मिल सकी है।

आदिवासी समाज का कहना है कि उनकी आस्था प्रकृति पर आधारित है, जिसे “सरना धर्म” के रूप में जाना जाता है। वे सूर्य, चंद्रमा, धरती, जंगल, नदी और जीव-जंतुओं की पूजा करते हैं, जो उनकी संस्कृति और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में उन्हें किसी अन्य धर्म के अंतर्गत वर्गीकृत करना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता है, इसके बावजूद “सरना धर्म” को मान्यता न मिलना आदिवासी समाज के साथ अन्याय है।

साथ ही पारसनाथ पहाड़ को लेकर भी मुद्दा उठाया गया। आदिवासी समाज इसे “मरांग बुरु” के नाम से पवित्र स्थल मानता है। संगठन ने आरोप लगाया कि इस स्थल को जैन समुदाय को सौंप दिया गया है और इसे पुनः आदिवासियों को सौंपने की मांग की गई है।

संगठन ने झारखंड सरकार, केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से अपील की कि आदिवासियों की धार्मिक पहचान, आस्था और पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए शीघ्र ठोस कदम उठाए जाएं। अब देखना होगा कि आदिवासी समाज की यह लंबे समय से चली आ रही मांग सरकार तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचती है और क्या “सरना धर्म” को वह संवैधानिक पहचान मिल पाती है, जिसकी अपेक्षा की जा रही है।

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