अमर बलिदानी हवलदार अब्दुल हमीद: साहस, शौर्य और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा

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वरुण कुमार, लेखक एवं कवि

Jamshedpur : भारतीय सैन्य इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनका स्मरण होते ही साहस, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की तस्वीर आंखों के सामने उभर आती है। कंपनी क्वार्टरमास्टर हवलदार अब्दुल हमीद उन्हीं अमर वीरों में शामिल हैं। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में खेमकरण सेक्टर के आसल उत्ताड़ की लड़ाई के दौरान उन्होंने जिस अदम्य साहस और युद्ध-कौशल का परिचय दिया, वह आज भी भारतीय सैनिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

10 सितंबर 1965 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनके सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

पैटन टैंकों के सामने अदम्य साहस

सितंबर 1965 में पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में पाकिस्तान ने बड़े पैमाने पर बख्तरबंद हमला किया। उसके पास अमेरिकी निर्मित शक्तिशाली पैटन टैंक थे, जिन्हें उस समय आधुनिक और बेहद प्रभावशाली युद्धक टैंकों में गिना जाता था। भारतीय सेना के सामने चुनौती कठिन थी, लेकिन भारतीय सैनिकों ने सीमित संसाधनों के बावजूद असाधारण साहस का परिचय दिया।

इसी मोर्चे पर अब्दुल हमीद ने अपनी जीप पर लगी 106 मिमी रिकॉयलेस राइफल के साथ दुश्मन के टैंकों का मुकाबला किया। गन्ने के खेतों और इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए वे अपनी जीप को छिपाकर उपयुक्त स्थिति में पहुंचते और मौका मिलते ही पैटन टैंकों पर सटीक निशाना साधते।

उनकी रणनीति में साहस के साथ-साथ असाधारण सूझबूझ भी थी। वे एक स्थान से गोली चलाने के बाद अपनी स्थिति बदल लेते थे, जिससे दुश्मन के लिए उनका पता लगाना कठिन हो जाता था। इस प्रकार उन्होंने पाकिस्तानी बख्तरबंद हमले के सामने प्रभावी प्रतिरोध किया।

युद्ध-वृत्तांतों में उनके द्वारा नष्ट किए गए टैंकों की संख्या अलग-अलग बताई जाती है। इसलिए उनकी वीरता का आकलन केवल किसी एक संख्या तक सीमित करना उचित नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने भारी बख्तरबंद हमले के सामने अद्भुत साहस और युद्ध-कौशल का परिचय दिया।

मातृभूमि की रक्षा में दिया सर्वोच्च बलिदान

10 सितंबर 1965 को भी अब्दुल हमीद मोर्चे पर डटे रहे। एक और पाकिस्तानी टैंक को निशाना बनाते समय दुश्मन की गोलीबारी की चपेट में उनकी जीप आ गई। इस हमले में वे गंभीर रूप से घायल हुए और अंततः मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय उनकी आयु लगभग 32 वर्ष थी।

उनकी शहादत ने यह संदेश दिया कि युद्ध केवल अत्याधुनिक हथियारों से नहीं, बल्कि सैनिक के साहस, प्रशिक्षण, धैर्य और युद्ध-बुद्धिमत्ता से भी लड़ा जाता है। आसल उत्ताड़ की लड़ाई में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी बख्तरबंद हमले का प्रभावी प्रतिरोध किया और यह क्षेत्र 1965 के युद्ध के महत्वपूर्ण मोर्चों में गिना गया।

परमवीर चक्र से सम्मानित

अब्दुल हमीद का जीवन भारतीय सैनिक की उस भावना का प्रतीक है, जिसमें व्यक्तिगत सुरक्षा से ऊपर राष्ट्र की रक्षा का दायित्व होता है। उनकी वीरता और सर्वोच्च बलिदान के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया।

उनकी स्मृति में पंजाब के खेमकरण क्षेत्र में स्मारक भी स्थापित है, जहां उनकी शहादत को श्रद्धापूर्वक याद किया जाता है। उनकी स्मृति में भारत सरकार के डाक विभाग ने 28 जनवरी 2000 को विशेष डाक टिकट भी जारी किया था।

आज उनका नाम भारतीय सैन्य इतिहास में साहस, शौर्य और बलिदान के प्रतीक के रूप में अमर है।

अब्दुल हमीद की कहानी केवल 1965 के युद्ध की कहानी नहीं है। यह उस सैनिक की कहानी है, जिसने सीमित साधनों के बावजूद अदम्य आत्मविश्वास और साहस के साथ दुश्मन की चुनौती का सामना किया और अंततः देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही है कि हम उनके साहस, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति समर्पण को सदैव स्मरण रखें तथा आने वाली पीढ़ियों को उनकी वीरगाथा से परिचित कराते रहें।

अमर बलिदानी परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद को शत-शत नमन।

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