Ranchi : राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) की ओर से सर्कुलर रोड स्थित परिसदन में आयोजित दो दिवसीय सुनवाई के दौरान जमीन विवाद, जिला प्रशासन, विश्वविद्यालय, शिक्षा, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग तथा सीसीएल से संबंधित कुल 70 मामलों की सुनवाई की गई। आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा ने बताया कि सुनवाई के दौरान कई मामलों में आयोग के हस्तक्षेप से पीड़ितों को राहत मिली है। इनमें जमीन पर कब्जा, रैयती भूमि पर सड़क निर्माण, विश्वविद्यालय में पीएचडी के वायवा में देरी और आदिवासी समुदाय की बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मामले शामिल हैं।
जमीन विवाद के कई मामलों में पीड़ितों को मिली राहत
डॉ. आशा लकड़ा के अनुसार, रांची जिले से संबंधित लगभग 30 से 32 मामलों की सुनवाई की गई। इनमें शिक्षा, जमीन और विश्वविद्यालय से जुड़े मामले प्रमुख रहे।
उन्होंने बताया कि निर्मला नामक महिला की जमीन पर कब्जा कर लिया गया था। आयोग के हस्तक्षेप के बाद संबंधित जमीन का दखल-दिहानी कराया गया। इसी तरह सुनीता सांगा की जमीन का भी दखल-दिहानी हुआ।
रांची नगर निगम क्षेत्र में एक रैयती जमीन पर सड़क निर्माण कराया जा रहा था। आयोग के हस्तक्षेप के बाद निर्माण कार्य पर रोक लगाई गई और संबंधित रैयत को जमीन वापस दिलाई गई। निर्माण स्थल से सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी हटाई गई।
पांकी निवासी सीताराम भगत की सरना, मसना और हड़गड़ी प्रकृति की भूमि पर कब्जा कर बंदोबस्ती किए जाने का मामला भी आयोग के समक्ष आया। डॉ. लकड़ा ने बताया कि आयोग के हस्तक्षेप के बाद संबंधित भूमि की बंदोबस्ती निरस्त कर दी गई।
वहीं, कांके में सात लोगों की जमीन पर कथित रूप से जमीन दलाल द्वारा कब्जा किए जाने के मामले में भी आयोग ने हस्तक्षेप किया। उनके अनुसार, अब संबंधित लोग अपनी-अपनी जमीन पर खेती कर रहे हैं।
पीएचडी वायवा में देरी का मामला सुलझा
रांची विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहीं शकुंतला उरांव का वायवा नहीं होने का मामला भी आयोग के समक्ष आया था। डॉ. आशा लकड़ा ने बताया कि आयोग के हस्तक्षेप के बाद विश्वविद्यालय ने उनका वायवा घोषित कर दिया है। उन्होंने कहा कि एक-दो दिनों में उन्हें डिग्री भी प्रदान किए जाने की उम्मीद है।
इसके अलावा, मांझी के बकाया भुगतान से जुड़े मामले में भी आयोग के हस्तक्षेप के बाद राशि का भुगतान कराया गया।
रामगढ़ में 100 परिवारों के लिए शौचालय निर्माण की प्रक्रिया शुरू
डॉ. आशा लकड़ा ने बताया कि रामगढ़ जिले में करमाली समुदाय के लगभग 100 परिवारों के पास शौचालय की सुविधा नहीं थी। इस समस्या को आयोग के संज्ञान में लाए जाने के बाद शौचालय निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। उन्होंने दिसंबर तक निर्माण कार्य पूरा होने की उम्मीद जताई।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय के लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना और उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना आयोग की प्राथमिकताओं में शामिल है।
एससी-एसटी थाने में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश
गिरिडीह जिले से संबंधित एक अनुसूचित जाति के मामले में आयोग ने सुनवाई के दौरान उपस्थित डीएसपी को आवश्यक निर्देश दिए। डॉ. आशा लकड़ा ने बताया कि संबंधित मामले में एससी-एसटी थाने में प्राथमिकी दर्ज करने, जांच कर आरोपपत्र दाखिल करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है।
मारपीट और प्राथमिकी दर्ज नहीं करने की शिकायत
सुनवाई के दौरान मंटू मुर्मू ने भी आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि जेपीएससी-जेएसएससी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के विरोध में वे अपने सहयोगियों के साथ राज्य सरकार का पुतला दहन करने पहुंचे थे। इसी दौरान पार्टी का पट्टा पहने कुछ लोगों ने उनके और उनके सहयोगियों के साथ मारपीट की।
मंटू मुर्मू ने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित लोग मॉब लिंचिंग की घटना को अंजाम देने की तैयारी में थे। उन्होंने दावा किया कि मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए एससी-एसटी थाने जाने पर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समक्ष शिकायत दर्ज कराई।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि संबंधित पुलिस रिकॉर्ड और जांच के आधार पर ही हो सकेगी।
झारखंड के 19-20 जिलों के मामलों की समीक्षा
एनसीएसटी सदस्य डॉ. आशा लकड़ा ने कहा कि आयोग देशभर के आदिवासी समुदायों से संवाद कर उनकी समस्याएं सुन रहा है। झारखंड में लगभग 19 से 20 जिलों के मामलों की समीक्षा की जा चुकी है।
उन्होंने बताया कि रांची के अलावा गढ़वा, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, धनबाद, बोकारो, पूर्वी सिंहभूम और गिरिडीह सहित विभिन्न जिलों के लोग अपनी शिकायतें लेकर आयोग पहुंच रहे हैं। इनमें सरकारी सेवाओं, जमीन विवाद और अत्याचार से संबंधित मामले प्रमुख हैं।
डॉ. लकड़ा के अनुसार, पहले आयोग के पास लगभग 300 मामले थे, जबकि अब शिकायतों की संख्या बढ़कर हजारों में पहुंच गई है। इसे उन्होंने आदिवासी समाज में अपने अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता का संकेत बताया।
बोकारो में रुकी विकास योजनाएं भी पूरी हुईं
आयोग की सदस्य ने बताया कि बोकारो जिले की सात-आठ मुखियाओं ने विकास कार्यों में आ रही बाधाओं को लेकर आयोग से गुहार लगाई थी। आयोग के हस्तक्षेप के बाद जिले में रुकी हुई विकास योजनाओं को पूरा किया गया।
उन्होंने कहा कि आयोग उन लोगों तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है, जो आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण न्याय पाने के लिए कोर्ट-कचहरी तक नहीं पहुंच पाते। आयोग में उनकी शिकायतें सुनी जा रही हैं और समस्याओं के समाधान के लिए संबंधित विभागों को निर्देश दिए जा रहे हैं।
डॉ. आशा लकड़ा ने कहा कि जरूरतमंद आदिवासी परिवारों को उनका हक और अधिकार दिलाने की दिशा में हो रहे प्रयासों से उन्हें संतुष्टि मिल रही है। उन्होंने जोर दिया कि जमीन, शिक्षा, सरकारी सेवा और अत्याचार से जुड़े मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए संबंधित विभागों की जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।
दो दिवसीय सुनवाई के दौरान सामने आए मामलों ने आदिवासी समुदाय की जमीन, शिक्षा, बुनियादी सुविधाओं और कानूनी अधिकारों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से सामने रखा। आयोग के हस्तक्षेप से कई मामलों में राहत मिलने की जानकारी दी गई, जबकि अन्य मामलों में आगे की कार्रवाई संबंधित विभागों की जांच और अनुपालन पर निर्भर करेगी।
















