Adityapur : 1 मई मजदूर दिवस के अवसर पर जहां एक ओर मंचों से मजदूरों को ‘राष्ट्र निर्माता’ बताकर सम्मानित किया गया, वहीं दूसरी ओर सरायकेला-आदित्यपुर के औद्योगिक गलियारों में श्रमिकों की जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आई।
सरायकेला और आदित्यपुर जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक आज भी न्यूनतम मजदूरी, PF और ESIC जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। श्रम विभाग के दावे कागजों तक सीमित दिखाई देते हैं, जबकि वास्तविकता में मजदूरों को तय मानकों के अनुरूप भुगतान नहीं मिल रहा।
श्रम कानूनों के अनुसार 8 घंटे की कार्यावधि निर्धारित है, लेकिन कई फैक्ट्रियों में मजदूरों से 10 से 12 घंटे तक काम कराया जा रहा है। ओवरटाइम का भुगतान भी नियमानुसार नहीं किया जाता। हजारों ठेका मजदूर सामाजिक सुरक्षा योजनाओं जैसे PF और ESIC से बाहर हैं, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

सुरक्षा मानकों की स्थिति भी चिंताजनक है। कई औद्योगिक इकाइयों में श्रमिकों को हेलमेट, जूते और अन्य सुरक्षा उपकरण तक उपलब्ध नहीं कराए जाते। ऐसे में हादसों की स्थिति में सबसे ज्यादा नुकसान दिहाड़ी और ठेका मजदूरों को उठाना पड़ता है। कई मामलों में न तो समुचित इलाज मिलता है और न ही मुआवजा।
मजदूर दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि Haymarket Affair से जुड़ी है, जहां मजदूरों ने 8 घंटे काम के अधिकार के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दी थी। लेकिन 140 साल बाद भी यहां के श्रमिक उसी अधिकार के लिए संघर्ष करते नजर आ रहे हैं।
श्रमिकों का कहना है कि सिर्फ भाषण और सम्मान से उनका पेट नहीं भरता। उन्हें उनका हक, सम्मान और सुरक्षित कार्य वातावरण चाहिए। उनका स्पष्ट कहना है कि जब तक न्यूनतम मजदूरी, 8 घंटे की शिफ्ट और ओवरटाइम का उचित भुगतान सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक मजदूर दिवस का उत्सव केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।










