senior citizens : कानून और समाज मिलकर करेंगे बुज़ुर्ग महिलाओं की सुरक्षा, अब नहीं चलेगा अत्याचार

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Ranchi : हर वर्ष 15 जून को मनाया जाने वाला विश्व वरिष्ठ नागरिक दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस (WEAAD) न केवल बुज़ुर्गों के सम्मान की याद दिलाता है, बल्कि यह चेतावनी भी देता है कि समाज में बुज़ुर्ग महिलाओं और पुरुषों के साथ हो रहे अत्याचार अब कानून की नज़र से नहीं बच सकते।

अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने इस अवसर पर बुज़ुर्ग महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव, हिंसा और उपेक्षा पर व्यापक कानूनी दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए बताया कि भारत में ऐसे कई सशक्त कानून मौजूद हैं जो वरिष्ठ नागरिकों, विशेषकर वृद्ध महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा करते हैं।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: बुज़ुर्गों की नई कानूनी ढाल

नवगठित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 144(1)(d) के अनुसार यदि माता-पिता अपने जीवनयापन में असमर्थ हैं तो वे अपनी संतान, चाहे वह पुत्र हो या पुत्री, दोनों से भरण-पोषण की मांग कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि विवाहित पुत्री भी इस उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं है। यह प्रावधान केवल कानूनी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है, जो यह अपेक्षा करता है कि संतान अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करे।

हिंदू कानून: नैतिकता के साथ विधिक उत्तरदायित्व

हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 और मिताक्षरा प्रणाली यह मानती हैं कि पुत्र को अपनी आय या उत्तराधिकार से अलग भी माता-पिता का भरण-पोषण करना ही होगा।

धारा 20 में यह स्पष्ट किया गया है कि जब तक माता-पिता स्वयं के भरण-पोषण में असमर्थ हैं, तब तक संतान कानूनी रूप से उत्तरदायी होगी।

इस्लामिक, ईसाई, सिख और पारसी दृष्टिकोण

हानाफ़ी इस्लामी कानून में माँ को प्राथमिकता देते हुए पुत्र-पुत्री दोनों को माता-पिता का भरण-पोषण करने का उत्तरदायित्व दिया गया है। अगर संतान सक्षम नहीं है, तो कोर्ट उसे मजबूर नहीं कर सकती, लेकिन नैतिक दृष्टिकोण से उसे प्रेरित किया जा सकता है।

सिख, ईसाई और पारसी समुदायों में पृथक पारिवारिक कानून की अनुपस्थिति में ये समुदाय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता या सामान्य विधिक उपायों का सहारा ले सकते हैं।

वरिष्ठ नागरिकों का संरक्षण अधिनियम, 2007: विशेष सुरक्षा कवच

इस कानून के अंतर्गत जैविक, दत्तक और सौतेले माता-पिता सब शामिल हैं। अगर कोई संतान अपने वृद्धजन को जानबूझकर छोड़ देती है, तो उसे तीन माह तक की जेल या ₹5,000 तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह अपराध संज्ञानात्मक और जमानती है। राज्य सरकारों को भी इसकी निगरानी और क्रियान्वयन हेतु सक्रिय रहना होता है।

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