हेमंत सरकार का पेसा कानून 2025 जनजातीय परंपराओं के खिलाफ : हरिचरण साण्डिल

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Guwa:जनजाति सुरक्षा मंच पश्चिमी सिंहभूम के जिला संयोजक हरिचरण साण्डिल ने राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित पेसा कानून 2025 को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन सरकार द्वारा तैयार किया गया यह कानून जनजातीय समाज की रूढ़ी-परंपराओं और सामाजिक संरचना के बिल्कुल विपरीत है तथा इसके माध्यम से पारंपरिक व्यवस्था को कमजोर करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।
हरिचरण साण्डिल ने कहा कि झारखंड का प्रस्तावित पेसा कानून, केंद्रीय पेसा कानून 1996 की मूल भावना के विपरीत प्रभाव डालेगा। विशेषकर कोल्हान क्षेत्र में सदियों से चली आ रही विल्किंसन रूल्स आधारित व्यवस्था—जहां दिउरी, मुंडा और मानकी समाज का नेतृत्व करते हैं—को यह कानून नजरअंदाज करता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनुमति के बिना न तो विदेशी धर्म प्रचार संभव है और न ही चर्च निर्माण। यह प्रावधान पेसा कानून 1996 की आत्मा है, लेकिन राज्य सरकार के नए मसौदे में इन बातों को कमजोर किया गया है। साथ ही उन्होंने कहा कि धर्मांतरित व्यक्ति रूढ़ी व्यवस्था के अनुसार ग्राम सभा की अध्यक्षता नहीं कर सकते, जबकि नए पेसा कानून में इस पर स्पष्टता का अभाव है।
हरिचरण साण्डिल ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार के पेसा कानून में अफसरशाही हावी रहेगी और पारंपरिक स्वशासन प्रणाली को कमजोर किया जाएगा। उनके अनुसार, मुंडा-मानकी व्यवस्था को मुखिया प्रणाली में समाहित कर सरकारी अधिकारियों की निगरानी में ग्राम सभा संचालित करने का प्रयास किया जा रहा है, जो आदिवासी स्वायत्तता के खिलाफ है।
उन्होंने यह भी कहा कि कोल्हान क्षेत्र में देशाउली जैसे पवित्र धार्मिक स्थलों को पेसा कानून में धार्मिक स्थल के रूप में चिह्नित नहीं किया जाना एक गंभीर चूक है। इससे जनजातीय आस्था और सांस्कृतिक पहचान को नुकसान पहुंचेगा।
अंत में हरिचरण साण्डिल ने कहा कि यह पेसा कानून जनजातीय समाज के अनुरूप नहीं है और न ही उनके हित में है। इसलिए जनजाति सुरक्षा मंच इसका विरोध करता है और मांग करता है कि पेसा कानून 1996 के अनुरूप, रूढ़ी-परंपराओं को मजबूत करते हुए नया कानून बनाया जाए।

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