पुजोत्सव में मुस्कान बाँटने की पहल” — ‘मुखबई आलापचारिता’ का मानवीय अभियान

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कोलकाता/जमशेदपुर।
जब संस्कृति केवल मंच तक सीमित न रहकर समाज की संवेदनाओं से जुड़ती है, तब वह न केवल मनोरंजन का माध्यम होती है, बल्कि समाज को जोड़ने और संवेदनशीलता को पल्लवित करने का सशक्त जरिया बन जाती है। ऐसी ही एक मिसाल पेश कर रही है कोलकाता और जमशेदपुर में सक्रिय सांस्कृतिक संस्था “मुखबई आलापचारिता”, जो वर्षों से साहित्य, संगीत, कला और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।संस्था ने एक बार फिर सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाते हुए “पूजो में नया कपड़ा” नामक अभियान की शुरुआत की है। यह अभियान पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े पर्व दुर्गापूजा के अवसर पर उन आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के लिए है, जो पर्व की रौनक में अक्सर हाशिए पर रह जाते हैं।

इस अभियान का उद्देश्य न केवल नए कपड़े देना है, बल्कि उनके चेहरे पर वह मुस्कान लाना है, जो सामान्यतः संसाधनों के अभाव में खो जाती है। “मुखबई आलापचारिता” का मानना है कि त्योहार केवल सजावट, भोग और आरती तक सीमित नहीं होते — वे भावनाओं का उत्सव होते हैं, जिन्हें सभी को समान रूप से महसूस करने का हक है।संस्था ने इस वर्ष भी अभियान को विस्तार देते हुए एक नए क्षेत्र को चुना है, जहाँ जरूरतमंदों के बीच नए वस्त्र वितरित किए जाएंगे। इस प्रयास के अंतर्गत न केवल वस्त्र इकट्ठा किए जा रहे हैं, बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक और ससम्मान वितरित करने की योजना भी बनाई गई है।

इस पुनीत कार्य के प्रचार के लिए संस्था ने एक सार्वजनिक पोस्टर भी जारी किया है, जिसमें इस अभियान से जुड़ने की अपील की गई है। संस्था का स्पष्ट संदेश है— “अगर आपके आसपास कोई इस प्रयास में सहयोग करना चाहता है — चाहे वस्त्र, समय, संसाधन या भावनात्मक समर्थन के रूप में — तो ‘मुखबई आलापचारिता’ परिवार आपका खुले दिल से स्वागत करता है। संस्था के सदस्यों का कहना है कि वे इस प्रयास को एक परंपरा बनाना चाहते हैं — जहाँ हर साल पूजा के अवसर पर कोई न कोई नया क्षेत्र, नया समुदाय इस खुशी में सम्मिलित हो सके।

संस्था की ओर से अपील:
“आइए, हम मिलकर इस पर्व को केवल सजावट और आयोजन तक सीमित न रखें,
बल्कि उन लोगों तक भी पहुंचाएं, जिनके जीवन में त्योहार की चमक कहीं खो गई है।”

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