उन्मादी भीड़ भविष्य के परिणाम भूल जाती है: ढाका में दीपू चंद्र दास की हत्या ने मानवता को झकझोरा

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Jamshedpur:धर्म के नाम पर उन्माद जब भीड़ का रूप ले लेता है, तब इंसानियत सबसे पहले दम तोड़ती है। बांग्लादेश के मैमनसिंह जिले में फैक्ट्री में काम करने वाले युवा मजदूर दीपू चंद्र दास की निर्मम हत्या ने यही भयावह सच एक बार फिर उजागर कर दिया है। ईशनिंदा के आरोप में उन्मादी भीड़ ने पहले उसे पीट-पीटकर मार डाला, फिर शव को पेड़ से लटकाकर जला दिया। यह घटना न केवल बांग्लादेश बल्कि पूरे उपमहाद्वीप के लिए चेतावनी है कि सांप्रदायिक उन्माद किस कदर समाज को खोखला कर रहा है।

पुलिस जांच में अब तक ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह सिद्ध हो कि दीपू चंद्र दास ने किसी धर्म या धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाई थी। इसके बावजूद अफवाह और उकसावे के आधार पर भीड़ ने कानून अपने हाथ में ले लिया। समाचार एजेंसियों के अनुसार, इस मामले में अब तक 12 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। रविवार को गिरफ्तार किए गए दो युवकों—आशिक और क्यूम—की उम्र करीब 25 वर्ष बताई गई है।

बांग्लादेश में ईशनिंदा के लिए कोई अलग कानून नहीं है। वहां भी ब्रिटिश कालीन दंड संहिता की धारा 295(ए) लागू होती है, जो जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने पर कारावास या जुर्माने का प्रावधान करती है। बावजूद इसके, कट्टरपंथी तत्व अक्सर कानून से ऊपर उठकर मौत की सजा जैसी मांग करते रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला ईशनिंदा से अधिक भीड़ द्वारा की गई जघन्य हत्या का है, जिसमें कठोरतम सजा दी जानी चाहिए।

प्रश्न यह है कि क्या बांग्लादेश की न्यायपालिका इस उन्मादी भीड़ को उदाहरणात्मक दंड देने में सक्षम होगी? यदि ऐसा नहीं हुआ और मामला केवल कागजी कार्रवाई तक सिमट गया, तो यह संदेश जाएगा कि अल्पसंख्यकों की जान की कीमत कुछ भी नहीं। जिस देश के निर्माण में भारत की ऐतिहासिक भूमिका रही हो, वहां इस तरह अल्पसंख्यक हिंदू की हत्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी गंभीर चिंता का विषय है।

इस घटना पर भारत के विदेश मंत्रालय ने पहली बार औपचारिक प्रतिक्रिया देते हुए बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। भारत ने स्थिति पर करीबी नजर रखने और बांग्लादेशी अधिकारियों से संपर्क में रहने की बात कही है। हालांकि, इस कूटनीतिक चिंता का जमीनी असर कितना होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।

साफ है कि यदि दोषियों को सख्त सजा नहीं मिली, तो उन्मादी तत्वों का हौसला बढ़ेगा और समाज में नफरत की आग और भड़केगी। दीपू चंद्र दास को इंसाफ दिलाना केवल एक व्यक्ति के लिए न्याय नहीं, बल्कि मानवता और कानून के राज की परीक्षा है।

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