करम पर्व पर प्रकृति संरक्षण का संदेश, गीत-झूमर से सजा बालीगुमा का करम अखाड़ा

Share करें

✓ Link copy हो गया!

Jamshedpur : बालीगुमा सुखना बस्ती स्थित करम अखाड़ा में बालीगुमा करम अखाड़ा कमिटी के तत्वावधान में करम पर्व पारंपरिक रीति-रिवाज, आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया। कुड़माली कैलेंडर के अनुसार आयोजित पर्व में करम वृक्ष की विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इसके साथ ही करम गीत, झूमर और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ।

करम पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, कृषि जीवन, सामाजिक एकता और पूर्वजों की प्रकृति-केंद्रित जीवन-दृष्टि का प्रतीक माना जाता है। आयोजन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि पूर्वजों ने जंगल, पेड़-पौधे, नदी, पहाड़, मिट्टी, बीज, वर्षा और खेती को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते हुए ऐसी परंपराएं विकसित कीं, जिनमें प्रकृति के सम्मान और संरक्षण की भावना प्रमुख रही।

प्रकृति संरक्षण के बिना सुरक्षित भविष्य संभव नहीं

आयोजकों ने कहा कि मनुष्य का अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है। धरती अन्न देती है, जंगल जीवनदायी संसाधन उपलब्ध कराते हैं, नदियां जल का स्रोत हैं और पेड़ जीवन के लिए आवश्यक हवा प्रदान करते हैं। ऐसे में प्रकृति का संरक्षण केवल पर्यावरण बचाने का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी है।

वक्ताओं ने जंगलों की कटाई, जलस्रोतों के विनाश, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से बढ़ते पर्यावरणीय असंतुलन पर चिंता जताई। नेपाल में हाल में हुई प्राकृतिक त्रासदी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन पर्यावरणीय क्षति और अनियोजित विकास कई परिस्थितियों में उनके प्रभाव को गंभीर बना सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ऐसे समय में करम पर्व का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है कि विकास प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाकर होना चाहिए।

झूमर और करम गीतों ने बांधा समां

आयोजन के दौरान बृहद झारखंड क्षेत्र के चर्चित झूमर कलाकार भोलानाथ महतो एवं राजदूत महतो ने करम गीतों की शानदार प्रस्तुति दी। पारंपरिक गीत और झूमर की धुनों से पूरा करम अखाड़ा उत्सव के रंग में रंग गया। बड़ी संख्या में उपस्थित लोगों ने लोकगीत, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद लिया।

मुख्य आयोजक दिलीप कडुआर ने कहा कि करम पर्व पूर्वजों की उस जीवन-पद्धति का हिस्सा है, जिसमें प्रकृति को जीवन का आधार माना गया है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने की इस सोच को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। उनके अनुसार, करम पर्व परंपरा के साथ प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देता है।

मुख्य आयोजक सरियान काडुआर ने कहा कि आधुनिक विकास के दौर में प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि करम पर्व यह संदेश देता है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है और उसकी भाषा, संस्कृति, पर्व तथा जीवन-व्यवस्था प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए जंगल, जमीन, जल और पर्यावरण की रक्षा करना सामूहिक जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि करम अखाड़ा जैसे आयोजन परंपराओं को जीवित रखने के साथ युवाओं को अपनी संस्कृति, भाषा और प्रकृति से जोड़ने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

करम पर्व के अवसर पर आयोजकों ने प्रकृति, जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के साथ लोक-संस्कृति एवं पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

Leave a Comment

The specified slider id does not exist.