जमशेदपुर में डहरे टुसु परब: सांस्कृतिक गर्व और जनसहभागिता का प्रेरक उत्सव

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Jamshedpur:रविवार को शहर की धरा पर डहरे टुसु परब ने अपने चौथे साल में भी जनसहभागिता, अनुशासन और सांस्कृतिक चेतना का एक शानदार उदाहरण पेश किया। मौसम की प्रतिकूलता के बावजूद हजारों नागरिकों ने इस परंपरागत उत्सव में भाग लेकर यह साबित कर दिया कि संस्कृति और लोकपरंपरा की शक्ति अडिग रहती है।
डिमना से दोपहर 1:00 बजे शुरू हुई शोभा यात्रा शाम 6:00 बजे साकची के आमबागान मैदान पहुँची। ढोल, धंस और मदार की थापों पर थिरकते कदमों और गूंजते टुसु गीतों ने पूरे मार्ग को जीवंत बना दिया। पीले रंग की सांस्कृतिक आभा और लोकगीतों की गूंज ने दर्शकों के दिलों में लोकसंस्कृति के प्रति गहरा उत्साह जगाया।
महिलाओं की भागीदारी ने आयोजन को नई ऊर्जा दी। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाएं गीत और नृत्य के माध्यम से यह संदेश दे रही थीं कि संस्कृति को आगे बढ़ाने की असली शक्ति उन्हीं के हाथ में है।
यात्रा मार्ग में डिमना, संकोसाई, मानगो, पुराना कोर्ट और आमबागान क्षेत्रों में स्थानीय नागरिकों एवं समाजसेवियों ने चना, पानी, चाय, खिचड़ी और मुड़ी-घुगनी जैसी सुविधाओं की व्यवस्था कर आयोजन में सहयोग और सेवा-भावना का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
वृहद झारखंड कला संस्कृति मंच द्वारा आयोजित इस शोभा यात्रा में पारंपरिक चौड़ल, टुसू प्रतिमा, लोकनृत्य और लोकसंगीत का सम्मिलन था। पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता और पत्नी सुधा गुप्ता ने आयोजन में शामिल होकर टीम को नए साल की शुभकामनाएं दीं।
आयोजन से जुड़े दीपक रंजीत ने कहा, “हम लोग थे, हैं और रहेंगे। डहरे टुसु परब हमारी सांस्कृतिक पहचान और निरंतरता का प्रतीक है। मौसम या परिस्थिति कोई भी बाधा हमारी परंपरा को रोक नहीं सकती। हमारा लक्ष्य इस लोकसंस्कृति को और सशक्त बनाकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना है।”
जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन के सहयोग के बिना इस विशाल और अनुशासित आयोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, आयोजन समिति ने सभी विभागों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
डहरे टुसु परब ने यह स्पष्ट कर दिया कि जमशेदपुर में लोकसंस्कृति न केवल जीवित है, बल्कि संगठित, सशक्त और भविष्य की ओर अग्रसर है। यह पर्व झारखंडी अस्मिता, सांस्कृतिक गर्व और सामाजिक एकजुटता का मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है।

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