Jamshedpur : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नेताओं, राजधानियों और राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं है। देश की आजादी की नींव उन अनगिनत किसानों, आदिवासियों और वनवासियों के बलिदान से भी बनी है, जिन्होंने अपने अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति दी। ऐसे ही महान जननायकों में एक नाम है अमर शहीद नानक भील, जिनका बलिदान राजस्थान के आदिवासी और किसान आंदोलनों के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।
13 जून 1922 को बूंदी रियासत के डाबी गांव में घटित घटना केवल एक गोलीकांड नहीं थी, बल्कि वह शोषण और अत्याचार के खिलाफ जनप्रतिरोध का ऐसा अध्याय था जिसने पूरे हाड़ौती क्षेत्र में चेतना की नई लहर पैदा कर दी। नानक भील का बलिदान आदिवासी समाज के आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई का प्रतीक बन गया।
वर्ष 1890 में बूंदी रियासत के धनेश्वर क्षेत्र में जन्मे नानक भील एक साधारण परिवार से आते थे। बचपन से उन्होंने अपने समाज को ब्रिटिश शासन और स्थानीय सामंती व्यवस्था के दोहरे शोषण का शिकार होते देखा। उस दौर में भील समुदाय से जबरन बेगार ली जाती थी और विरोध करने वालों को कठोर दंड दिया जाता था।
इन्हीं परिस्थितियों ने नानक भील के भीतर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का साहस पैदा किया। धीरे-धीरे वे अपने समाज की समस्याओं और अधिकारों के लिए संघर्ष का चेहरा बन गए।
1920 के दशक में राजस्थान में किसान आंदोलनों की लहर उठ रही थी। बिजौलिया किसान आंदोलन की सफलता से प्रेरित होकर बूंदी क्षेत्र में भी बरड़ किसान आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व राजस्थान सेवा संघ के प्रमुख कार्यकर्ता पंडित नैनूराम शर्मा कर रहे थे।
नानक भील इस आंदोलन के प्रमुख जननेताओं में शामिल हुए। वे गांव-गांव जाकर लोकगीतों, भजनों और जनसभाओं के माध्यम से लोगों को जागरूक करते थे। उन्होंने भील समाज को बेगार और अन्याय के खिलाफ संगठित किया तथा अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी।
उनकी लोकप्रियता और बढ़ते जनसमर्थन से ब्रिटिश प्रशासन और स्थानीय सामंत चिंतित हो उठे थे।
किसानों और आदिवासियों की मांगों को लेकर 13 जून 1922 को बूंदी रियासत के डाबी गांव में एक विशाल सभा आयोजित की गई। हजारों किसान और आदिवासी इस सभा में शामिल हुए थे। सभा पूरी तरह शांतिपूर्ण थी और लोगों के हाथों में तिरंगे झंडे तथा आजादी के नारे गूंज रहे थे।
सभा की व्यवस्था की जिम्मेदारी स्वयं नानक भील संभाल रहे थे। इसी दौरान पुलिस अधीक्षक इकराम हुसैन सशस्त्र पुलिस बल के साथ वहां पहुंचा और सभा को समाप्त करने का आदेश दिया।
जब जनता पीछे हटने को तैयार नहीं हुई, तब नानक भील हाथ में तिरंगा लेकर मंच पर खड़े हो गए और राजस्थान सेवा संघ का प्रसिद्ध ‘झंडा गीत’ गाने लगे—
“प्राण मित्रों भले ही जावे, पर झंडा नीचे न आवे…”
यह दृश्य प्रशासन को नागवार गुजरा और बिना किसी पूर्व चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दे दिया गया।
पुलिस की गोलियों से सभा स्थल दहल उठा। इसी दौरान एक गोली नानक भील के सीने में जा लगी। उनके साथ खड़े वीर युवा देवीलाल गुर्जर भी गोली लगने से शहीद हो गए।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गोली लगने के बाद भी नानक भील ने तिरंगे को झुकने नहीं दिया। वे लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े, लेकिन उनके भीतर संघर्ष और स्वतंत्रता की लौ अंतिम क्षण तक जलती रही।
उनकी शहादत ने आंदोलन को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसे और अधिक व्यापक बना दिया।
ब्रिटिश शासन और बूंदी रियासत को उम्मीद थी कि प्रमुख नेता की मृत्यु के बाद आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन हुआ इसका उलटा। नानक भील की शहादत ने किसानों और आदिवासियों में नए जोश का संचार किया।
राजस्थान के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार माणिक्य लाल वर्मा ने उनकी स्मृति में प्रसिद्ध लोकगीत ‘अर्जी’ की रचना की। यह गीत वर्षों तक किसान आंदोलनों और स्वतंत्रता संघर्ष का प्रेरणास्रोत बना रहा।
आज बूंदी जिले के डाबी क्षेत्र में अमर शहीद नानक भील और देवीलाल गुर्जर की स्मृति में भव्य शहीद स्मारक स्थापित है। यह केवल एक स्मारक नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान, किसान संघर्ष और देशभक्ति का प्रतीक है।
हर वर्ष 13 जून को यहां श्रद्धांजलि कार्यक्रमों और मेलों का आयोजन किया जाता है, जहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचकर इन अमर शहीदों को नमन करते हैं।
लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास लेखन में आदिवासी और जनजातीय नायकों को वह स्थान नहीं मिल सका जिसके वे वास्तविक हकदार थे। लेकिन आज देश धीरे-धीरे उन गुमनाम वीरों को याद कर रहा है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में असाधारण योगदान दिया।
नानक भील का जीवन यह संदेश देता है कि देशभक्ति किसी जाति, वर्ग या शिक्षा की मोहताज नहीं होती। अन्याय के खिलाफ संघर्ष और मातृभूमि के प्रति समर्पण ही सच्चे राष्ट्रनिर्माण की पहचान है।
आज उनकी पुण्यतिथि पर राष्ट्र इस वीर आदिवासी सपूत को श्रद्धापूर्वक नमन करता है।
“मातृभूमि की स्वतंत्रता और जनजातीय समाज के अधिकारों के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले अमर शहीद नानक भील को विनम्र श्रद्धांजलि।









