विश्व बालश्रम निषेध दिवस: बचपन बचाने की वैश्विक पुकार और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

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Jamshedpur : दुनिया जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान और डिजिटल क्रांति के नए आयाम गढ़ रही है, उसी समय लाखों बच्चे आज भी अपने बचपन से वंचित होकर मजदूरी करने को मजबूर हैं। सुबह की पहली किरण के साथ स्कूल जाने की उम्र में कई बच्चे चाय की दुकानों, ढाबों, कारखानों, खेतों और निर्माण स्थलों पर काम करते दिखाई देते हैं। उनके हाथों में किताबों की जगह औजार हैं और सपनों की जगह जिम्मेदारियों का बोझ।

हर वर्ष 12 जून को विश्व भर में विश्व बालश्रम निषेध दिवस (World Day Against Child Labour) मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य बाल श्रम के खिलाफ वैश्विक जागरूकता बढ़ाना और बच्चों को शिक्षा, सुरक्षा तथा सम्मानजनक बचपन का अधिकार दिलाने की दिशा में सामूहिक प्रयासों को मजबूत करना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल एक दिन की जागरूकता से करोड़ों बच्चों का भविष्य बदला जा सकता है?


अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) द्वारा वर्ष 2002 में शुरू किए गए इस दिवस का उद्देश्य बाल श्रम को समाप्त करने के लिए वैश्विक प्रतिबद्धता को मजबूत करना था। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के तहत वर्ष 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को समाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन वर्ष 2026 में भी यह लक्ष्य दूर दिखाई देता है।

दुनिया भर में आज भी लगभग 16 करोड़ बच्चे किसी न किसी रूप में बाल श्रम में संलग्न हैं। इनमें से करीब 8 करोड़ बच्चे खतरनाक कार्यों में लगे हुए हैं, जहां उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक विकास पर गंभीर खतरा मंडराता रहता है। एशिया और अफ्रीका के कई देशों में यह समस्या सबसे अधिक गंभीर बनी हुई है।

भारत में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती। कानूनों और सरकारी योजनाओं के बावजूद असंगठित क्षेत्र, घरेलू कामकाज, कृषि, ईंट-भट्टों और छोटे उद्योगों में बाल श्रम की घटनाएं अब भी सामने आती हैं।

बाल श्रम के पीछे सबसे बड़ा कारण गरीबी है। जब परिवार के सामने दो वक्त की रोटी का संकट होता है, तब बच्चों की शिक्षा पीछे छूट जाती है और उन्हें कमाई का साधन बना दिया जाता है।

इसके अलावा सस्ती मजदूरी की चाह रखने वाले नियोक्ता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच की कमी, सामाजिक जागरूकता का अभाव और पारंपरिक सोच भी इस समस्या को बढ़ावा देते हैं। कई बार परिवार यह मान लेते हैं कि बच्चों को जल्दी काम सीखना ही उनके भविष्य के लिए बेहतर है।

बाल श्रम का सबसे भयावह रूप वह है, जिसमें बच्चों को जोखिम भरे कार्यों में लगाया जाता है। खदानों, कारखानों, पटाखा उद्योगों, कांच उद्योगों और रसायनों से जुड़े कार्यों में काम करने वाले बच्चों को गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान उठाना पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार कम उम्र में कठिन श्रम बच्चों के शारीरिक विकास, शिक्षा, आत्मविश्वास और भविष्य की संभावनाओं पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 24 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों में काम पर लगाने पर रोक लगाता है। वहीं बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से किसी भी व्यवसाय में काम कराना प्रतिबंधित है तथा 14 से 18 वर्ष के किशोरों को खतरनाक उद्योगों में नियोजित नहीं किया जा सकता।

कानून का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के लिए जुर्माने और कारावास का भी प्रावधान है। बावजूद इसके, प्रभावी निगरानी और कठोर क्रियान्वयन की आवश्यकता लगातार महसूस की जाती है।


बाल श्रम की समस्या का समाधान केवल कानूनी कार्रवाई से संभव नहीं है। इसके लिए गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार सृजन, सामाजिक जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को साथ लेकर चलना होगा।

स्कूलों को बच्चों के लिए आकर्षक और रोजगारपरक शिक्षा का केंद्र बनाना होगा। गरीब परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत करनी होगी और समाज को यह समझना होगा कि किसी बच्चे से काम करवाना उसकी मदद नहीं, बल्कि उसके अधिकारों का हनन है।


विश्व बालश्रम निषेध दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह हमें याद दिलाता है कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान उसकी आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि उसके बच्चों की मुस्कान से होती है।

हर बच्चे को शिक्षा, खेल, सुरक्षा और सपने देखने का अधिकार है। उनके हाथों में किताबें, रंग और खिलौने होने चाहिए, न कि मजदूरी का बोझ।

मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की पंक्तियाँ इस संदेश को और गहराई देती हैं—

“बच्चे ख़ुदा की नेमत हैं, इन्हें महफ़ूज़ रहने दो,
किताबों से सजी दुनिया में, इन्हें भी गुनगुनाने दो।”

विश्व बालश्रम निषेध दिवस पर यह संकल्प लेना होगा कि हम अपने आसपास किसी भी बच्चे को मजदूरी करते देखें तो चुप न रहें, बल्कि उसके अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आएं। क्योंकि जब तक हर बच्चे का बचपन सुरक्षित नहीं होगा, तब तक किसी भी राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता।

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