जब-जब जंगल आंदोलन की बात होगी, तब-तब देवेंद्र माझी का नाम इतिहास के पन्नों का गौरव बनेगा

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Chaibasha : जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को नई दिशा देने वाले जननायक स्वर्गीय देवेंद्र माझी की पुण्यतिथि पर आज गोइलकेरा में भव्य श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम की सभी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं, जहां हजारों की संख्या में अनुयायी जुटकर उस महान विभूति को नमन करेंगे, जिसने आदिवासियों की आवाज बनकर इतिहास रचा।

देवेंद्र माझी को कोल्हान-पोड़ाहाट के जंगल आंदोलन का प्रणेता और आदिवासी अस्मिता के प्रतीक के रूप में जाना जाता है। 15 सितंबर 1947 को एक गरीब किसान परिवार में जन्मे माझी ने बचपन से ही विषम परिस्थितियों का सामना किया। सामाजिक अन्याय के खिलाफ उन्होंने विद्यालय काल से ही विद्रोह की चिंगारी जलाई और बाद में आदिवासी अधिकार आंदोलन के अग्रदूत बने।

उन्होंने बीड़ी श्रमिकों, भूमिहीनों और आदिवासियों को संगठित कर उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी। 1971 में पहली बार जेल गए, जहां शिबू सोरेन से मुलाकात ने झारखंड आंदोलन को नई दिशा दी। जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने जंगल की जमीन पर बसे मूलवासियों के नाम पट्टा की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन छेड़ा।

8 सितंबर 1980 को गुवा गोलीकांड ने आंदोलन को और प्रचंड बना दिया। सत्ता ने उन्हें कई बार झूठे मामलों में फंसाया, लेकिन उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अंततः 14 अक्टूबर 1994 को गोइलकेरा हाट बाजार में बारूदी विस्फोट से उनकी हत्या कर दी गई।

आज भी उनके विचार और संघर्ष की गूंज सारंडा के जंगलों में सुनाई देती है। श्रद्धांजलि सभा केवल एक स्मरण नहीं, बल्कि यह संघर्ष की उस विरासत को जीवित रखने का संकल्प होगा जिसने झारखंड के आदिवासी आंदोलन को पहचान दिलाई।

“जब-जब जंगल आंदोलन की बात होगी, तब-तब देवेंद्र माझी का नाम इतिहास के पन्नों में गौरव से अंकित रहेगा।”

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