Searaikela : सरायकेला-खरसावां जिला अंतर्गत चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के दलमा गज परियोजना से हाथियों का एक झुंड नीमडीह प्रखंड के आण्डा पंचायत के टोला बनगोड़ा में डेरा जमाए हुए है। भोजन और पानी की तलाश में दलमा सेंचुरी से भटके ये गजराज अब ग्रामीणों के लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, दलमा वाइल्डलाइफ सेंचुरी के 193.22 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस जंगल में करीब 60-70 जलस्रोत मौजूद हैं, लेकिन भीषण गर्मी के कारण अधिकांश जलस्रोत सूख चुके हैं। पानी और भोजन की कमी से हाथियों का झुंड चांडिल डैम जलाशय की ओर बढ़ा, जहां जलक्रीड़ा करते भी देखे गए हैं।

ग्रामवासी राजेंद्र सिंह ने बताया कि हाथियों की आमद से इलाके में भय और दहशत का माहौल है। ये जंगली हाथी कभी भी खेत, घर और जानमाल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं, ह्यूमन राइट्स जिला अध्यक्ष प्रमोद कुमार शर्मा ने वन विभाग की निष्क्रियता पर सवाल उठाते हुए कहा कि करोड़ों रुपये की गज परियोजना के बावजूद न तो हाथियों की निगरानी हो रही है, न ही स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है।
वन विभाग द्वारा बनाए गए वॉच टावर और मचान पर कर्मचारी नियमित तौर पर नहीं पहुंचते हैं, जिससे हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखना मुश्किल हो गया है। जबकि दलमा सेंचुरी में प्रतिवर्ष “एलिफेंट सेंसस” जैसे वैज्ञानिक कार्यक्रमों के जरिए ट्रैक और वॉटरहॉल आधारित गिनती होती है। इसके बावजूद हाथियों की निगरानी में भारी लापरवाही सामने आ रही है।

वन्यजीवों का लगातार पलायन, कौन है जिम्मेदार?
एक वक्त था जब दलमा सेंचुरी को रॉयल बंगाल टाइगर रिजर्व के रूप में जाना जाता था। यहां बाघ, भालू, अजगर, लोमड़ी, गिद्ध, कोबरा जैसे दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव सहज रूप से देखे जाते थे। लेकिन अब इनका नामो-निशान मिटता जा रहा है। पक्षियों की चहचहाहट से गूंजते जंगल अब सूने हो चुके हैं।
वन्यजीवों के संरक्षण के नाम पर जहां सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, वहीं जंगल की अवैध कटाई, पेड़-पौधों की कमी और जलस्रोतों का सूखना चिंता का विषय बन गया है। पौष्टिक भोजन देने वाले डका, गलगल, पेजों, केंदू, सातसौं जैसे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से हाथियों के भोजन की कमी भी उजागर हो रही है।

पर्यटन को बढ़ावा, पर संरक्षण की अनदेखी
दलमा सेंचुरी को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए वन विभाग द्वारा ईको सेंसेटिव जोन में गेस्ट हाउस और रोपवे जैसी सुविधाएं शुरू की गई हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जहां एक ओर पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो रही है, वहीं दूसरी ओर वन्यजीवों का आवास क्षेत्र सिमटता जा रहा है।
सवाल यह है कि जब सेंचुरी खुद ही जीवनविहीन होती जा रही है, तो क्या सिर्फ होर्डिंग और गाइडलाइन से जंगलों और जीव-जंतुओं का संरक्षण संभव है?











