Jamshedpur:झारखंड स्टेट बार काउंसिल चुनाव को लेकर अधिवक्ताओं के बीच चर्चा तेज हो गई है। इस बीच जमशेदपुर बार एसोसिएशन के सदस्य और समाजवादी चिंतक अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कहा है कि जिस तरह महिला अधिवक्ताओं के लिए 5 प्रतिशत हिस्सेदारी सुनिश्चित की गई है, उसी तरह वंचित समूहों की भागीदारी भी झारखंड राज्य बार काउंसिल में सुनिश्चित की जानी चाहिए।
अधिवक्ता पप्पू ने कहा कि झारखंड की पहचान आदिवासी संस्कृति, परंपरा और विरासत से है। ऐसे में यह गंभीर सवाल है कि राज्य गठन के बाद से अब तक कितने आदिवासी और भूमिपुत्रों को झारखंड स्टेट बार काउंसिल में प्रतिनिधित्व मिला है। उन्होंने राज्य के करीब 30 हजार अधिवक्ताओं से अपील की कि वे पूर्वाग्रह त्यागकर और दिल बड़ा कर झारखंड के भूमिपुत्रों के पक्ष में मतदान करें।
उन्होंने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा से आग्रह किया कि काउंसिल द्वारा मनोनीत किए जाने वाले दो अधिवक्ताओं में से एक अनुसूचित जाति और एक अनुसूचित जनजाति वर्ग से होना चाहिए, ताकि सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके।
सुधीर कुमार पप्पू ने कहा कि झारखंड स्टेट बार काउंसिल का चुनाव आगामी 12 मार्च को होने जा रहा है, जिसमें लगभग 100 प्रत्याशी मैदान में हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन उम्मीदवारों में से वास्तव में कौन अधिवक्ताओं के सम्मान, अधिकार और सुरक्षा की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा है।
उन्होंने कहा कि पिछले आठ वर्षों में बार काउंसिल में करीब 25 सदस्य, एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष रहे, कई बैठकें और समितियां बनीं, लेकिन ईमानदारी से पूछा जाए तो अधिवक्ताओं के हित में ऐसा कौन-सा ठोस काम हुआ है, जिसे पूरे झारखंड के वकील गर्व से याद कर सकें।
अधिवक्ता पप्पू ने कहा कि राज्य के जिला, अनुमंडल और निचली अदालतों में अधिवक्ताओं को अक्सर कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कभी थाना-पुलिस के मामलों में तो कभी अदालत के कर्मचारियों या न्यायिक पदाधिकारियों के साथ अनावश्यक टकराव की स्थिति बन जाती है। ऐसे समय में अधिवक्ताओं को उम्मीद रहती है कि स्टेट बार काउंसिल उनकी आवाज बनेगी, लेकिन कई बार यह आवाज वहां तक पहुंच ही नहीं पाती।
उन्होंने कहा कि चुनाव के समय बड़े-बड़े पोस्टर, बैनर और वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये वादे हवा हो जाते हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि अधिवक्ता पोस्टर और नारों से नहीं, बल्कि काम और नीयत के आधार पर फैसला करें।
अंत में उन्होंने झारखंड के सभी अधिवक्ताओं से अपील की कि वे ऐसे प्रतिनिधियों को चुनें जिनकी आंदोलनकारी पृष्ठभूमि हो, जिनकी नीयत और नीति स्पष्ट हो, ताकि वर्षों से लंबित एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट लागू हो सके और अधिवक्ताओं के लिए तकनीकी व कौशल प्रशिक्षण शिविर नियमित रूप से आयोजित किए जा सकें।








