Jamshedpur : झारखंड में ओबीसी आरक्षण को लेकर राज्य सरकार की गंभीरता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यह सवाल किसी विपक्षी दल ने नहीं, बल्कि स्वयं सरकार के विधानसभा में दिए गए जवाब ने उजागर किया है। जमशेदपुर पूर्वी की विधायक पूर्णिमा साहू द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरकार ने जो स्पष्टीकरण दिया, उसने राज्य की कार्यशैली पर नई बहस छेड़ दी है।
सोमवार को विधायक पूर्णिमा साहू ने विधानसभा में सरकार से पूछा था कि ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए 2019 में प्रारंभ हुआ आर्थिक एवं सामाजिक सर्वेक्षण आखिर कब पूरा होगा और इसके आधार पर सरकार पिछड़ा वर्ग को उनका अधिकार कब देगी?
इसके जवाब में सरकार ने कहा कि कोरोना महामारी के कारण सर्वेक्षण पूरा नहीं किया जा सका। इस जवाब को पूर्णिमा साहू ने हास्यास्पद और बहानेबाज़ी करार दिया। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी को बीते चार साल से अधिक समय हो चुका है, बावजूद इसके सरकार कोई ठोस कारण प्रस्तुत नहीं कर पाई। यह सरकार की कार्यप्रणाली और पिछड़ा वर्ग के मुद्दों के प्रति उसकी उदासीनता को दर्शाता है।
“बार-बार साबित हुआ कि यह सरकार पिछड़ा विरोधी है”
विधायक साहू ने कहा कि यदि सरकार की नीयत साफ़ होती, तो 2019 में शुरू हुआ सर्वेक्षण अब तक पूरा कर लिया जाता और झारखंड में जनसंख्या आधारित आरक्षण लागू हो चुका होता। उन्होंने तमिलनाडु मॉडल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ करुणानिधि सरकार ने न सिर्फ सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कराया, बल्कि विधानसभा से बिल पारित कर 69% आरक्षण लागू किया—जबकि केंद्र सरकार की सीमा 50% है।
उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “तमिलनाडु में तो आपके ही सहयोगी दल की सरकार है, कम से कम उनसे सीख ही लें। लेकिन झारखंड सरकार केवल बहाने बनाकर समय निकाल रही है।”
“ओबीसी को उनका हक दिलाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए”
पूर्णिमा साहू ने स्पष्ट कहा कि झारखंड में जनसंख्या आधारित आरक्षण लागू करने के लिए आर्थिक एवं सामाजिक सर्वेक्षण का त्वरित पूरा होना अनिवार्य है। यदि सरकार वास्तव में पिछड़ा वर्ग को उसका अधिकार दिलाना चाहती है, तो इसे सर्वोच्च प्राथमिकता में लेकर तुरंत कदम उठाए।
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल सर्वेक्षण का नहीं है, बल्कि झारखंड के लाखों पिछड़ा वर्ग के सम्मान और उनके संवैधानिक हक का है।









