Jamshedpur : श्री श्री शीतला माता मंदिर, टुइलाडुंगरी में बुधवार को हलषष्ठी ‘कमर छठ’ का पर्व श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। मंदिर परिसर में सैकड़ों महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
महिलाओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मंदिर समिति की ओर से सभागार में विशेष रूप से अस्थायी तालाब (सगरी) का निर्माण कराया गया था। सगरी के समीप महिलाओं ने सामूहिक रूप से हलषष्ठी माता का पूजन किया और कथा का श्रवण करते हुए पारंपरिक अनुष्ठान संपन्न किए। पूजा के दौरान मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।
मंदिर समिति के अध्यक्ष दिनेश कुमार, कार्यकारी अध्यक्ष मोतीलाल साहू, महामंत्री गिरधारी लाल, उपाध्यक्ष परमानंद कौशल और कोषाध्यक्ष त्रिवेणी कुमार के नेतृत्व में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं की गईं। महिलाओं को पूजा कराने और कथा सुनाने का कार्य परमानंद कौशल ने किया।
संतान की दीर्घायु और मंगलकामना से जुड़ा है व्रत
मंदिर समिति के अध्यक्ष दिनेश कुमार ने कहा कि हलषष्ठी ‘कमर छठ’ केवल धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि मातृत्व की श्रद्धा, संतान के प्रति ममता और भारतीय लोक परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति है। माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ यह कठिन व्रत रखती हैं। ऐसे पर्व संस्कृति, संस्कार और पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करते हैं।
उन्होंने बताया कि हलषष्ठी पर्व को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम के जन्म से भी जोड़ा जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख आयुध हल होने के कारण इस पर्व का संबंध कृषि, श्रम, धरती और प्रकृति से भी माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को माताएं संतान के कल्याण के लिए यह व्रत करती हैं।
पूजन में दिखी प्रकृति और कृषि संस्कृति की झलक
हलषष्ठी पूजा में क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार झरबेरी, पलाश, कांस और कुश जैसी वनस्पतियों के साथ विभिन्न अनाज एवं पारंपरिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। कई क्षेत्रों में प्रतीकात्मक तालाब बनाकर उसके समीप पूजा करने की परंपरा भी है।
पूजन सामग्री में महुआ, पसहर/पसही चावल, भुने अनाज, चना, जौ, धान, अरहर, मूंग, मक्का, पलाश, झरबेरी, कांस और कुश आदि का उपयोग किया जाता है। क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार भैंस के दूध, दही और घी का भी विशेष महत्व माना जाता है। हलषष्ठी की परंपरा में हल से जुती भूमि में उत्पन्न अनाज-सब्जियों के बजाय तालाब में पैदा होने वाली अथवा बिना हल के उगने वाली पारंपरिक खाद्य सामग्री को महत्व देने की मान्यता भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
मातृशक्ति और लोक संस्कृति की आस्था का पर्व
दिनेश कुमार ने कहा कि हलषष्ठी जैसे पर्व समाज को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक परंपराओं से जोड़ने का काम करते हैं। इस पर्व में जहां संतान के प्रति मां की निःस्वार्थ भावना दिखाई देती है, वहीं प्रकृति, कृषि और लोकजीवन के प्रति भारतीय समाज की गहरी आस्था भी प्रतिबिंबित होती है।
कार्यक्रम में जमुना निषाद, इंदा साहू, मंजू साहू, द्रोपदी साहू, हेमा साहू, मंजू ठाकुर, पिंकी कुमारी, कमला निषाद, फुलेश्वरी निषाद, फूलों देवी, पुष्पा निषाद, कुंती देवी, राजवती देवी, देववती, चित्रा साहू, पार्वती देवी, चंदा देवी, सोनी, पूनम ठाकुर, तिज्या निषाद और प्राची निषाद समेत बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित रहीं। युवाओं में रोशन साहू, ओम निषाद और दीपक सिन्हा समेत अन्य लोगों ने आयोजन में सहयोग किया।
















