Ranchi : झारखंड में पत्रकारों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़ी वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर विधानसभा के पटल पर पहुंची है। जरमुंडी विधायक देवेंद्र कुंअर ने पत्रकारों के लिए सुरक्षा कानून बनाए जाने को लेकर सरकार से सवाल किया है। उन्होंने महाराष्ट्र में लागू Maharashtra Media Persons and Media Institutions (Prevention of Violence and Damage or Loss to Property) Act, 2017 का हवाला देते हुए झारखंड में भी पत्रकारों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी प्रावधान किए जाने की जरूरत बताई।
विधानसभा में पूछे गए सवाल में पत्रकारों के हित में पूर्व में सरकार की ओर से की गई विभिन्न घोषणाओं का भी जिक्र किया गया। इनमें पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकार कल्याण कोष, स्वास्थ्य एवं दुर्घटना बीमा, पेंशन, आवास तथा पत्रकार मान्यता नियमों के सरलीकरण जैसी मांगें शामिल हैं। विधायक ने सरकार से जानना चाहा कि इन घोषणाओं में से अब तक कितनी योजनाएं वास्तव में धरातल पर लागू हो सकी हैं।
सवाल का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि पूर्व में की गई घोषणाएं अब तक लागू नहीं हुई हैं तो पत्रकारों की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और भविष्य को लेकर सरकार की आगे की क्या कार्ययोजना है।
पत्रकार संगठनों की ओर से पत्रकार सुरक्षा कानून की मांग लंबे समय से उठाई जाती रही है। AISMJWA समेत विभिन्न पत्रकार संगठनों का कहना है कि पत्रकारों की सुरक्षा और कल्याण से जुड़ी मांग किसी एक संगठन या व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे मीडिया समुदाय की चिंता है।
संगठन का दावा है कि अलग-अलग विधानसभा सत्रों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के विधायक पत्रकारों की सुरक्षा, बीमा, कल्याण कोष और अन्य सुविधाओं से जुड़े सवाल उठाते रहे हैं। इसके बावजूद ठोस नीति और प्रभावी कानून के स्तर पर अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकी है।
महाराष्ट्र में मीडिया कर्मियों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ हिंसा तथा संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं की रोकथाम के लिए वर्ष 2017 में कानून बनाया गया था। इसी मॉडल का उल्लेख करते हुए झारखंड में भी पत्रकारों के लिए कानूनी सुरक्षा का ढांचा तैयार करने की मांग सामने आई है।
झारखंड में पत्रकारों पर हमले, धमकी और काम के दौरान आने वाली चुनौतियों के बीच अब विधानसभा में उठे सवाल ने इस पुराने मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार इस बार पत्रकार सुरक्षा कानून की दिशा में ठोस पहल करेगी?
पत्रकार संगठनों का कहना है कि केवल घोषणाओं और आश्वासनों से पत्रकारों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। सुरक्षा कानून के साथ-साथ पत्रकार कल्याण कोष, स्वास्थ्य एवं दुर्घटना बीमा, पेंशन और आवास जैसी योजनाओं को भी स्पष्ट नीति और समयबद्ध तरीके से लागू करने की आवश्यकता है।
पत्रकारों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जब उनकी सुरक्षा और कल्याण से संबंधित मुद्दे लगातार विधानसभा में उठते रहे हैं, तो वर्षों बाद भी इन पर निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हो सकी।
अब इस पूरे मामले में सरकार और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अगले कदम पर नजर है। विधानसभा में उठे सवाल ने सरकार के सामने एक बार फिर स्पष्ट चुनौती रख दी है—क्या झारखंड पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कानून बनाएगा या वर्षों पुरानी यह मांग आगे भी फाइलों और घोषणाओं के बीच ही उलझी रहेगी?
















