Jamshedpur: पॉक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 के कथित दुरुपयोग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कहा कि यह कानून बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न और लैंगिक अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है तथा इसकी आवश्यकता और महत्व पर कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। हालांकि, कानून का उपयोग उसके मूल उद्देश्य के अनुरूप और संतुलित तरीके से होना भी उतना ही आवश्यक है।
उन्होंने बताया कि ‘In Re: Right to Privacy of Adolescents’ मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि कुछ मामलों में पॉक्सो अधिनियम का इस्तेमाल उन परिस्थितियों में भी किया जा रहा है, जहां वास्तविक रूप से यौन शोषण का मामला नहीं होता।
अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कहा कि न्यायालय ने सुनवाई के दौरान माना कि 15 से 18 वर्ष की आयु किशोरावस्था का संवेदनशील दौर होता है, जहां भावनात्मक, मानसिक और सामाजिक विकास के साथ आकर्षण और संबंध बनना स्वाभाविक प्रक्रिया है। न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि यदि दो किशोर अपनी इच्छा से साथ चले जाते हैं, तो ऐसे मामलों में राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी चिंता जताई कि कई मामलों में माता-पिता सामाजिक प्रतिष्ठा या तथाकथित पारिवारिक सम्मान के कारण सहमति से बने किशोर संबंधों को भी पॉक्सो के तहत आपराधिक मामला बना देते हैं। बाद में अदालतों द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के बावजूद गिरफ्तारी, मुकदमे और सामाजिक बदनामी का प्रभाव संबंधित किशोरों पर लंबे समय तक बना रहता है।
सुधीर कुमार पप्पू ने बताया कि वर्तमान कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति ‘बच्चा’ माना जाता है। ऐसे में यदि दो नाबालिग आपसी सहमति से संबंध में हों, तब भी उनकी सहमति को कानून मान्यता नहीं देता और मामला पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इसी संदर्भ में कई देशों में लागू ‘Romeo and Juliet Clause’ की चर्चा होती है, जिसके तहत समान आयु वर्ग के किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाता। हालांकि भारत में ऐसा कोई कानूनी प्रावधान फिलहाल लागू नहीं है और यदि भविष्य में ऐसा कोई बदलाव किया जाता है तो इसके लिए संसद द्वारा कानून में संशोधन आवश्यक होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पॉक्सो अधिनियम का मूल उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण और उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करना है और इस उद्देश्य से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। साथ ही, केंद्र सरकार ने न्यायालय को अवगत कराया है कि कक्षा छह से चरणबद्ध तरीके से पॉक्सो कानून और बच्चों के अधिकारों के संबंध में जागरूकता कार्यक्रम संचालित करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।
अपने वक्तव्य के अंत में अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन किसी भी कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहती है जब उसका प्रयोग न्यायसंगत, संतुलित और उसके वास्तविक उद्देश्य के अनुरूप किया जाए, न कि पारिवारिक विवाद, सामाजिक दबाव या सम्मान के नाम पर।
















