Adityapur : सरायकेला में सोमवार से राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र एक बार फिर पारंपरिक धुनों, नगाड़ों की गूंज और ग्रामीण कलाकारों की जीवंत प्रस्तुतियों से सराबोर हो उठा। चैत्र पर्व के अवसर पर आयोजित ग्रामीण छऊ नृत्य प्रतियोगिता का शुभारंभ हुआ, जो केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि सदियों पुरानी विरासत का जीवंत उत्सव है।
यह प्रतियोगिता दूर-दराज के गांवों में छिपी प्रतिभाओं को मंच प्रदान करती है, जहां कलाकार अपने अद्भुत कौशल और पारंपरिक शैली के माध्यम से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। यह आयोजन झारखंड की सांस्कृतिक पहचान को संजोने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बना हुआ है।
इतिहास और विकास की कहानी
सरायकेला छऊ नृत्य की जड़ें कलिंग के गजपति शासन (1434-1541 ई.) तक जाती हैं, जहां इसे राजघराने का संरक्षण प्राप्त था। कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव को आधुनिक सरायकेला छऊ का जनक माना जाता है। उन्होंने पारंपरिक युद्ध कला ‘पारी-खंडा’ को नाट्यशास्त्र के तत्वों के साथ जोड़कर 1930 के दशक में इसे एक विशिष्ट नृत्य शैली का रूप दिया और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
1938 में सरायकेला के कलाकारों ने पहली बार यूरोप में प्रस्तुति देकर इस कला को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। बाद में वर्ष 2010 में यूनेस्को ने इसे ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ की सूची में शामिल कर विश्व स्तर पर मान्यता प्रदान की।
विशेषता और परंपरा
सरायकेला शैली की सबसे बड़ी खासियत इसके सूक्ष्म भावों वाले मुखौटे हैं। यहां कलाकार अपनी आवाज़ के बजाय शरीर की भंगिमाओं और मुखौटों के रंगों के माध्यम से पूरी कहानी प्रस्तुत करते हैं—देवताओं के लिए पीले या हरे रंग और असुरों के लिए काले या नीले रंग का प्रयोग किया जाता है।
संरक्षण और नई पहल
झारखंड सरकार द्वारा 1960 में स्थापित राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र इस कला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का प्रमुख केंद्र है। यहां 1995 से महिलाओं और किशोरियों को भी छऊ नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाने लगा, जिसकी पहल पूर्व निदेशक तपन पटनायक ने की।
आज इस केंद्र से हजारों छात्र-छात्राएं प्रशिक्षित होकर इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। ग्रामीण छऊ प्रतियोगिता न केवल इस परंपरा को जीवित रखती है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी बन रही है।









