मनोहरपुर में डहरे टुसु परब: लोकसंस्कृति की जीवंत परंपरा और जनसहभागिता का भव्य उत्सव

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Manoharpur:मनोहरपुर प्रखंड में आयोजित डहरे टुसु परब ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि झारखंड की लोकसंस्कृति आज भी उतनी ही जीवंत, संगठित और जनमानस से जुड़ी हुई है। डहरे टुसू संचालन समिति मनोहरपुर–आनंदपुर के तत्वावधान में शनिवार को इस पारंपरिक पर्व का भव्य आयोजन किया गया, जिसमें प्रतिकूल मौसम के बावजूद हजारों लोगों की सहभागिता देखने को मिली।
नंदपुर गांव से सुबह 11 बजे आरंभ हुई डहरे टुसु परब की शोभा यात्रा देर शाम करीब 5 बजे उन्धन स्थित शहीद निर्मल महतो चौक पहुंचकर संपन्न हुई। शोभा यात्रा के दौरान ढोल, नगाड़े, मदार की थाप और गूंजते टुसु गीतों ने पूरे क्षेत्र को उत्सवमय बना दिया। पीले रंग की सांस्कृतिक छटा, लोकधुनें और पारंपरिक अनुशासन ने कुड़मी समाज की सांस्कृतिक चेतना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
इस आयोजन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। पारंपरिक वेशभूषा में सजी महिलाओं ने लोकगीतों और नृत्य के माध्यम से यह संदेश दिया कि संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में उनकी भूमिका निर्णायक है।
शोभा यात्रा नंदपुर, डोंगाकाटा, ब्लॉक चौक, मनोहरपुर फॉरेस्ट नाका, लाइनपार, रेलवे क्रॉसिंग, इंदिरा नगर, संत अगस्तीन कॉलेज रोड होते हुए उन्धन मैदान पहुंची। मार्ग में स्थानीय नागरिकों और समाजसेवियों द्वारा हलवा, चना, पानी, चाय और पीठा की व्यवस्था कर सेवा-भावना का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया गया।
रंजित महतो गायक झूमर कला संस्कृति मंच के सहयोग से आयोजित इस शोभा यात्रा में पारंपरिक चौड़ल, टुसु प्रतिमा, लोकनृत्य और लोकसंगीत का अद्भुत संगम देखने को मिला। कार्यक्रम में समाज के अनेक प्रबुद्ध लोगों ने भाग लेकर डहरे टुसु परब और नववर्ष की शुभकामनाएं दीं।
आयोजन समिति के अध्यक्ष अनादि महतो ने कहा कि डहरे टुसु परब उनकी सांस्कृतिक पहचान और निरंतरता का प्रतीक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी परिस्थिति इस परंपरा को नहीं रोक सकती और आने वाली पीढ़ियों तक इसे सशक्त रूप में पहुंचाना ही आयोजन का मुख्य उद्देश्य है।
आयोजन समिति ने जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन के सहयोग की सराहना करते हुए कहा कि उनके समन्वय के बिना इतना बड़ा और अनुशासित आयोजन संभव नहीं हो पाता।
डहरे टुसु परब ने यह स्पष्ट कर दिया कि मनोहरपुर की लोकसंस्कृति न केवल जीवंत है, बल्कि संगठित, सशक्त और भविष्य की ओर अग्रसर भी है। यह पर्व झारखंडी अस्मिता, सांस्कृतिक गर्व और सामाजिक एकता का मजबूत प्रतीक बनकर उभरा।

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