आदित्यपुर (सरायकेला-खरसावां)
आदित्यपुर थाना अंतर्गत हरिओम नगर में पत्रकार अंकित शुभम और उनके परिवार पर हुए जानलेवा हमले के मामले में पुलिस की भूमिका लगातार सवालों के घेरे में आती जा रही है। घटना को दो दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है, जिससे स्थानीय लोगों और पत्रकार समुदाय में भारी आक्रोश व्याप्त है।
जांच में गंभीर अनियमितताओं के आरोप
पीड़ित पत्रकार का आरोप है कि पुलिस जांच की प्रक्रिया शुरू से ही संवेदनहीन और संदिग्ध रही। घटनास्थल पर दीवार पर लगे खून के धब्बों को देखकर भी जांच टीम ने पहले फोटो लेने से इनकार कर दिया। पत्रकार के विरोध के बाद ही पुलिस ने मजबूरी में साक्ष्य का फोटो लिया।
इतना ही नहीं, जांच के दौरान मौके पर पहुंचे पुलिसकर्मियों द्वारा पत्रकार के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग किए जाने का भी आरोप है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब एक पुलिसकर्मी ने कथित तौर पर यह टिप्पणी की—
अगर मैं जांचकर्ता होता, तो इस केस का मुख्य अभियुक्त पत्रकारों को ही बना देता।”
यह बयान न सिर्फ पुलिस की मानसिकता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता पर सीधा प्रहार माना जा रहा है।
आरोपी बेखौफ, पीड़ित असुरक्षित
पत्रकार अंकित शुभम का कहना है कि हमला करने वाला आरोपी खुलेआम इलाके में घूम रहा है, जबकि पुलिस उसे पकड़ने में नाकाम साबित हो रही है। उन्होंने सीधे तौर पर थाना प्रभारी की भूमिका को संदिग्ध बताते हुए आरोप लगाया कि पुलिस की कार्यशैली आरोपी को बचाने की दिशा में जाती दिख रही है।
थाना प्रभारी का दावा बनाम जमीनी हकीकत
थाना प्रभारी का कहना है कि मामले की जांच जारी है और जल्द ही आरोपी को गिरफ्तार किया जाएगा। हालांकि, जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आ रही है। गिरफ्तारी के बजाय पीड़ित पत्रकार को ही डराने-धमकाने की शिकायतें सामने आना पुलिस की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
स्थानीय लोगों और पत्रकारों का आक्रोश
इस पूरे प्रकरण को लेकर स्थानीय नागरिकों ने भी पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी जाहिर की है। लोगों का कहना है कि यदि एक पत्रकार और उसके परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तो आम नागरिकों की सुरक्षा का दावा खोखला साबित होता है।
स्थानीय लोगों और पत्रकार संगठनों ने आरोपी की अविलंब गिरफ्तारी और मामले की निष्पक्ष, उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
विडंबना: अपराधी की जगह पीड़ित पर दबाव
इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपराधी को कानून के कटघरे में लाने के बजाय, पीड़ित पक्ष पर ही दबाव बनाए जाने के आरोप लग रहे हैं। यह स्थिति न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करती है।









