ईरान—इजरायल युद्ध का थमना भारत के लिए जरूरी : निशिकांत ठाकुर

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Jamshedpur : मध्य-पूर्व में तेज होते सैन्य तनाव के बीच ईरान और इजरायल के बीच छिड़ा युद्ध वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संतुलन को गहराई से प्रभावित कर रहा है। इस संघर्ष का असर केवल क्षेत्रीय देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक और वैश्विक व्यापार से जुड़े देशों पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में यह युद्ध जितनी जल्दी थमे, उतना ही भारत और विश्व के लिए बेहतर होगा।

बताया जाता है कि 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा तेहरान में किए गए संयुक्त हवाई हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अली हुसैनी खामेनेई की हत्या हो गई। यह हमला तेहरान स्थित उनके आवासीय परिसर पर केंद्रित था, जहां 30 से अधिक बम गिराए गए। उपग्रह चित्रों के अनुसार “लीडरशिप हाउस कंपाउंड” को गंभीर क्षति पहुंची। इस हमले में खामेनेई के परिवार के कुछ करीबी सदस्य भी मारे गए।

घटना के बाद ईरान में 40 दिनों के राजकीय शोक की घोषणा की गई। इसके साथ ही इजरायल ने दावा किया कि ईरान ने नए सुप्रीम लीडर के रूप में मोजतबा खामेनेई को चुन लिया है। ईरान की ओर से भी इस दावे की पुष्टि कर दी गई है। वहीं अमेरिकी राजनीति में भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। फॉक्स न्यूज़ के एक कार्यक्रम में एंकर ब्रायन किल्मीड के अनुसार, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मोजतबा खामेनेई के नए सुप्रीम लीडर बनने पर असंतोष जताया है।

ईरान और इजरायल के बीच तनाव कोई नया नहीं है। इजरायल लंबे समय से ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता रहा है और उस पर परमाणु हथियार विकसित करने का आरोप लगाता रहा है। दूसरी ओर, ईरान ने इजरायल पर गाजा में नरसंहार का आरोप लगाया है।
इसी पृष्ठभूमि में इजरायल लगातार ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाई की मांग करता रहा है। यह संघर्ष उस वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था से भी जुड़ा है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के माध्यम से स्थापित की गई थी।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी इस युद्ध की निंदा करते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करने की अपील की है।

मध्य-पूर्व में बढ़ता सैन्य टकराव

मार्च 2026 में संघर्ष और तेज हो गया, जब ईरान ने अपनी सैन्य कार्रवाई ‘ट्रूथफुल प्रॉमिस-4’ के तहत इजरायल के साथ-साथ संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, जॉर्डन और सऊदी अरब में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए मिसाइल और ड्रोन हमले किए।
इन हमलों के अलावा पाकिस्तान और इराक में भी ईरानी हमलों की खबरें सामने आईं। पाकिस्तान के बलूचिस्तान क्षेत्र में जैश-उल-अदल के ठिकानों पर हमले किए गए। इन घटनाओं ने पूरे मध्य-पूर्व में अस्थिरता का माहौल पैदा कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन मिसाइल हमलों ने खाड़ी क्षेत्र की उस छवि को भी झटका दिया है, जिसे लंबे समय तक सुरक्षित व्यापारिक केंद्र माना जाता रहा है।

युद्ध की आर्थिक कीमत

मध्य-पूर्व में जारी इस संघर्ष का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इसका सीधा प्रभाव दिखाई दे रहा है।

ईरान के रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, युद्ध से ईरान को 24 से 35 अरब डॉलर तक का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुकसान हो सकता है। तेल डिपो और बुनियादी ढांचे को भारी क्षति पहुंच रही है।

इजरायल को भी आर्थिक झटका लग रहा है और उसे अनुमानित 11.5 से 17.8 अरब डॉलर तक की क्षति का सामना करना पड़ सकता है। वहीं अमेरिका के लिए भी यह युद्ध महंगा साबित हो रहा है। पेंटागन के रक्षा भंडार, विशेषकर पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों की संख्या तेजी से घट रही है, जिनकी कीमत प्रति मिसाइल लगभग 40 लाख डॉलर से अधिक है।

भारत पर संभावित असर

भारत सीधे तौर पर इस युद्ध का हिस्सा नहीं है, लेकिन इसके प्रभाव से अछूता भी नहीं रह सकता। खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं और उनकी सुरक्षा एक बड़ी चिंता का विषय बन सकती है।
इसके अलावा भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व से पूरा होता है। युद्ध लंबा खिंचने पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।

अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज के अनुसार, यदि युद्ध लंबा चला तो भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और रुपया कमजोर हो सकता है। साथ ही खाड़ी देशों से आने वाली लगभग 51 अरब डॉलर की रेमिटेंस भी प्रभावित हो सकती है।

संतुलित कूटनीति की चुनौती

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलित कूटनीति बनाए रखने की है। ईरान और इजरायल दोनों ही भारत के महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार हैं। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़ा होना भारत की विदेश नीति के लिए जटिल स्थिति पैदा कर सकता है।
यही कारण है कि भारत हमेशा संवाद और शांति के माध्यम से समाधान की वकालत करता रहा है। महात्मा गांधी की अहिंसा की नीति भी यही संदेश देती है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
निष्कर्ष

मध्य-पूर्व में जारी यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय युद्ध नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जा रहे हैं। यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर गंभीर रूप से पड़ेगा।

भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय जल्द से जल्द इस संघर्ष को रोकने और शांति स्थापित करने की दिशा में ठोस पहल करे। तभी भारत सहित पूरी दुनिया संभावित आर्थिक और मानवीय संकट से बच सकती है।

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