Jamshedpur:आदिवासी उरांव समाज संघ ने रविवार को अपने पारंपरिक मसना स्थल में पूर्वजों की स्मृति में हर्षोल्लास के साथ ‘हडबोडी अनुष्ठान’ सम्पन्न किया। पौष माह के कृष्ण पक्ष की तीसरी घड़ी में आयोजित होने वाला यह अनुष्ठान उरांव समुदाय के लिए अत्यंत पावन माना जाता है, जिसे ‘कोहां बेंजा’ (बड़ी शादी) के नाम से भी जाना जाता है।
सुबह से ही समुदाय के विभिन्न अखाड़ों के लोग मसना स्थल पर जुटने लगे। महिलाओं, पुरुषों और बुजुर्गों ने अपने-अपने पूर्वजों की कब्रों को फूलों से सजाया और घर में तैयार पारंपरिक व्यंजन नियमानुसार अर्पित किए। स्थल पर श्रद्धा, आस्था और सामुदायिक एकजुटता का सुंदर संगम देखने को मिला।
समिति के सचिव अनिल लकड़ा ने बताया कि इस वर्ष सातों अखाड़ों की भागीदारी उल्लेखनीय रही। वहीं रांची विश्वविद्यालय के कुड़ुख विभाग और सरना नवयुवक संघ के सदस्यों ने भी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
कार्यक्रम में हरि उरांव, डॉ. बंदे खलखो, साधु उरांव, सुखराम उरांव, जगदीश उरांव, लखन उरांव, गणेश उरांव, अमर उरांव, कृष्णा उरांव, पुष्पा किस्पोट्टा, सहित अनेक समाजसेवी उपस्थित रहे।
सभी ने पूर्वजों को नमन करते हुए 2 मिनट का मौन रखा और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। आगंतुकों के लिए चाय, खिचड़ी, घुघनी, मुड़ी आदि के कई स्टॉल लगाए गए थे। टेंट की व्यवस्था विक्रम लकड़ा द्वारा की गई।
कार्यक्रम में अलग-अलग परिवारों और समितियों की ओर से भोजन की विशेष व्यवस्था की गई—
स्व. बिरसा तिर्की एवं पालो तिर्की की स्मृति में पुत्र शोभा तीर्थ द्वारा झालमुड़ी
स्व. गांधी तिर्की (बान टोला) की स्मृति में चाय-बिस्कुट
मसना समिति द्वारा चाय-बिस्कुट व पानी
राजकमल लकड़ा (तेलंगाखुरी) द्वारा हलवा-खीर
बान टोला महिला समिति की ओर से खिचड़ी
धूमकुडिया समिति द्वारा चाय, घुघनी व बिस्कुट
क्षेत्रीय समिति के सदस्यों ने कहा कि यह दिन पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पूर्वजों ने समाज को शिक्षा, संस्कृति और विकास का मार्ग दिखाया है, इसलिए उनके आदर्शों का अनुसरण आवश्यक है।
उपसचिव लालू कुजूर ने मसना स्थल की स्वच्छता और संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की अपील की। कार्यक्रम में बाबूलाल बरहा, दुर्गा खलखो, कृष्णा टोप्पो, डोमा मिंज, धर्मा तिग्गा, छीदिया कच्छप, गणेश कच्छप, खुदिया कुजूर, शंभू टोप्पो, चंदन कच्छप, सुमित बरहा, रोहित खलखो, इशू टोप्पो सहित बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
उरांव समाज का यह वार्षिक आयोजन न केवल श्रद्धांजलि का अवसर है, बल्कि सामुदायिक एकता, परंपरा और संस्कृति को मजबूत करने का भी माध्यम बनता जा रहा है।









